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ISSN 2292-9754

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12.19.2014


शम्मा नहीं जलाऊँगा...

मासूमों की मौतों पर अब शम्मा नहीं जलाऊँगा।
तख़्ती लेकर हाथों में कोई राग नया ना गाऊँगा॥

सदियों से हम ऐसे ही अब तक ये करते आये हैं,
अपनों को फिर भी हम सब यूँही खोते आये हैं।
निर्दोषों की लाशों पर जो रोते हैं ग़म उनका है,
अब तक हम यूँही बस अपने अश्क़ बहाते आये हैं।
हर बार नया सर होता है पर गोली वही पुरानी है,
सिसक रहा है बचपन अब तो सहमी हुई जवानी है।
शामिल हूँ मैं ग़म में उनके पर मातम नहीं मनाऊँगा॥

क़त्ल हुआ मासूमों का जब हर ओर चीख पुकार हुई,
काँप उठी धरती भी उस दम ऐसी प्रबल चित्कार हुई।
विद्या के मन्दिर में ऐसा खेल घिनौना वो खेल गए,
पर हिम्मत ना हारी बच्चों ने गोली उनकी झेल गए।
मासूमों पर क़हर क्यूँ ढाया कहकर अल्लाह हू अकबर,
इस करनी पर मिल पायेगी क्या ठौर ख़ुदा के दर पर।
गर यही है फ़रमाने ख़ुदा तो ना ईद कभी मनाऊँगा॥

लौट गए घर को सब अपने नमाज़े जनाज़ा पढ़ते ही,
भूल गए हर दर्दोग़म नया सूरज आकाश में चढ़ते ही।
घर में पाला साँप तो उसको रहम न तुमपर आयेगा,
विषधर है जो इक ना इक दिन काट तुमको खायेगा।
इस्लाम हुआ बदनाम पुनः ज़ख़्मी क़ुरान की आयत है,
कर्बला के शहीदों से क्या मिली इन्हें यही विरासत है।
शब्द हुए हैं मौन रजत अब और न कुछ कह पाऊँगा॥


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