अवधेश कुमार मिश्र "रजत"

कविता
घर को ही पराया मान लिया
तंग आकर उनकी बेवफाई से
नदी जब चीरकर छाती पहाड़ों की निकलती है
चिता जलाना बन्द भी हो
मैं गुनहगार हूँ!!
यूँ तो इक नाज़ुक सी ....
शम्मा नहीं जलाऊँगा...
संस्कारों की पावन चुनर
सही ग़लत की दुविधा