अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
05.31.2016


तेरी ज़रूरत

तेरी तन्हाई से ज़्यादा
डर मुझे इस बात का था
कि कहीं, तेरे बिन
जीने की आदत न पड़ जाए मुझे,
और ये लाश फिर घूमती रहे,
हर राह-ए-गुज़र में..
बिना रूह, बिना हमसफ़र के,
बिना तेरे, बिना तेरी ज़रूरत के..
कहते हैं न वो,
कि अब तू नहीं
तेरा ग़म, तेरी जुस्तजू भी नहीं,
गुज़र रही है ज़िन्दगी कुछ इस तरह जैसे
इसे किसी के सहारे की आरजू भी नहीं।

डर था, और हो गया यही
तेरे बिन
गुज़रने की आदत डाल ली मैंने
और ये, तेरी यादो से भी
ज़्यादा दर्दनाक होता है,
जब याद आता है मुझे अचानक
कि उफ़!!
आज शायद याद ही नहीं किया मैंने तुम्हें..
या तेरी बातें
इस क़दर आदतन हो चुकी हैं,
कि उनका
होना या न होना भी याद नहीं होता.
जैसे शादी होने बाद
जीते हैं लोग अक्सर
और सच मानो,
ये किसी भी शादी या
ग़म-ए-मोहब्बत से
बड़ा ख़ूनी मंज़र है..
किसी के बिना जीने की आदत हो जाना,
और इससे भी ज्यादा बुरा,
इस डर का सच्चाई में बदल जाना..

तेरी ज़रूरतों के लिए
जीने को जी चाहता है.
जिस शख़्स को तेरी जरूरत नहीं,
इक सज़ा "क़ैद-ए-बा-मशक्कत" है उसे ढोना..


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें