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ISSN 2292-9754

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05.04.2016


जाने क्यों??

इस रात का इक साया है,
और सायों तले चल रही है ज़िन्दगी हमारी,
इक मौत महबूबा है और,
गुज़र रहे हैं हम उसकी ओर चलते हुए,

तुम्हारे साथ होने की ख़्वाहिशें हर वक़्त,
साँस के साथ जाकर, सीने से लगती है तुम्हारी जगह..

और मेरा होना,
तुम्हारे न होने का इक ज़ाहिर ख़याल बन चुका है जब

तब भला मेरी कविताएँ कैसी भी हों,
अधूरी हैं, टूटी हैं..

तुम्हारे बिम्बों के सहारे
लड़खड़ा कर चलती हैं मेरी बातें जो,
क्या सच कभी समझ न आते होंगे मेरे पयाम,
तुम्हारे सिवा यहाँ किसी को..??

हाँ तभी बेशक, मेरी तनहाई
तुम्हारी यादों की उपज नहीं होती है कभी..

पर कविताओं का तुकबंद होना ही बेहतर है,
आम लोगों को समझने और -
मेरा जीना आसान करने के लिए..


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