अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
03.06.2016


कैंसर

दिल जलता है मेरा,
सिगरेट की तरह,
तेरे कश हर वक़्त
मेरे होंठों पे होते हैं,
और तेरी यादें,
उड़ती नहीं धुँए की तरह..
सीने में और बैठती जाती है!

गोया तेरे नाम के कैंसर से
बहुत पहले से पीड़ित हूँ मैं,
और लाइलाज है बीमारी, ये
मेरे सारे डॉक्टर/दोस्त कह चुके है..
परहेज़ कई हैं,
कैंसर के साथ भी, लम्बी उम्र के लिए
पर उसके लिए मुझे,
“स्मोकिंग” छोड़ना पहली शर्त है..

हर बार नो स्मोकिंग के ऐड पर,
डर लगता है, कि ये धुआँ,
कही औरो की भी जान न ले ले,
“पैसिव स्मोकिंग” भी
पर्याप्त मात्रा में नुक़सान देय है

पर मेंरे कैंसर पर
बस हक़ है इक मेरा..

वैसे तो ये कैंसर
“जानदेवा” है मेरे ख़ातिर..
बस कभी कभी
खाँसते खाँसते ज़रूर हालत ख़राब हो जाती है..


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें