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04.09.2012

निजत्व

 रिश्तों की बेड़ियाँ अगर काट सकती
तो शायद हर नाम काट देती
पंख लगा कर अगर मैं उड़ सकती
तो शायद सबसे दूर मुक्त आकाश में विचरती

सपने देखना अगर मैं छोड़ पाती
तो शायद यथार्थ के कटु सत्यों का सामना कर पाती
अपनी हर अभिलाषा को अगर कैद कर पाती
तो शायद एक ही जगह स्थिर रह कर जी पाती

पर क्या करूँ
यह "अगर" - "शायद" तक ही सीमित है

मैं चाह कर भी रिश्तों के बाँध,
सपनों की नाव
अभिलाषाओं का बहाव नही छोड़ पाती
पता नहीं क्यों यथार्थ में रह कर भी
मैं अपने पंख नहीं काट पाती
हर कटुता को पहचान कर भी
मैं चाहत और आशा के दीप नहीं बुझाती
आकाश दूर है पर फिर भी उसमें विचरने की
राह मैं दिन रात खोजती
सभी दुखों को पहचान कर भी
मैं ज्यादा देर तक उदास नही रह पाती
मैं हर निगाह में प्यार और अपनापन ही झाँकती
मैं चाह कर भी वैसी नहीं हो पाती
जैसे अकसर हो जाते हैं लोग ।


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