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04.09.2012

बसंत

मोर की आवाज़ सुनाई देने लगी है
        कोयल भी धीरे धीरे
                बौर आए आम के वृक्ष पर
                      आने लगी है
                         शहतूत का पेड़ पहले जैसा फिर से
                               हरा हो गया है

ठंडी बयार के सुस्त होने से
काँच की खिड़कियाँ खुलने लगीं हैं

सुनाई देने लगी हैं
पड़ोसी नानी की आवाज़ें
रिश्तों में आई शीतलता भी
खिड़कियाँ खुलने से खत्म हो गई है

कितना अच्छा हो गर ना हो फिर से
सर्दियों का सा शीत जमाव
और ना हो इतनी अधिक गर्मी
कि लग ही जाए आग
ना हो ऐसी वर्षा
कि हर पहचान धुल जाए

क्या तुम रिश्तों में हमेशा नहीं रह सकते बसंत???


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