अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख पृष्ठ
04.09.2012

देश से दूर दो नैन

अमेरिका में रहते हुए अभी ज़्यादा समय नहीं हुआ। लगभग पाँच सालों से अमेरिका को अपना बनाने की कोशिश में हूँ। लेकिन दिल्ली ज़हन से निकलती ही नहीं है। वो दिल्ली जहाँ मैं जन्मी और बड़ी हुई। दिल्ली में सभी कुछ तो है मेरा! मेरा घर, विद्यालय, महाविद्यालय, रिश्तेदार, सहेलियाँ। इन सबको याद करती हूँ तो पाँच साल सदियों जैसे लगते हैं। पर जब अमेरिका को अपना कहने की बात आती है तो अभी भी ऐसा ही लगता है कि मैं नई हूँ।

अभी इस देश को जान रही हूँ, पिछले चार साल से नौकरी भी कर रही हूँ। हर रोज़ पहले बस फिर मेट्रो और फिर पैदल रास्ता पार करके ऑफिस तक की यात्रा पूरी होती है। यह समय पूरे दिन का सबसे अच्छा समय होता है। नए-नए चेहरे, नए भाव, सबके अलग तरह के कपड़े, कितनी ही संस्कृतियों का संगम इत्यादि देखने को मिलता है। किसी से नज़र मिल जाए तो मुस्कुराना, यह सब एक उत्साह पैदा करता है पूरे दिन के लिए और अपने देश से दूर होने के अहसास को भी थोड़ा कम करता है।

ऐसे समृद्ध देश में रहकर मैं अकसर भूल जाती हूँ कि यहाँ भी किसी को कोई दुख हो सकता है, या यहाँ भी कोई ग़रीब हो सकता है। शायद इतने समृद्ध देश में मैं कभी कभी अपने आप को और अपने आसपास के लोगों को भी संवेदनशून्य सा पाती हूँ। इस देश में रहकर लगने लगा था कि हर ओर कुशल मंगल है।

मेट्रो में जाते हुए संवेदना जागी जब एक नेत्रहीन महिला को अंधे व्यक्तियों के लिए विशेष रूप से ट्रेन्ड कुत्ते के साथ देखा। यहाँ सुविधाऐं बहुत हैं पर फिर भी नेत्रहीन तो नेत्रहीन ही है। अपने देश में कुछ भी बुरा या अस्वस्थ देख कर बहुत दुख होता था, पतानहीं क्यों यहाँ नहीं होता। उसी महिला को एक दिन ऑफिस के पास फिरसे देखा। उसके बाद कुछ ऐसा सिलसिला आरम्भ हुआ कि हर रोज़ कोई न कोई नेत्रहीन व्यक्ति कुत्ते या लाठी के साथ दिख ही जाता है।

जितने अधिक ऐसे लोग दिखे खोई संवेदना वापिस आने लगी। एक दिन एक नेत्रहीन को देख कर अपने कॉलेज के चार सहपाठी याद आए जो देख नहीं सकते थे। उनमें से एक तो काला चश्मा भी नहीं लगाता था और उसकी आँख के स्थान पर नसें दौड़ती दिखती थीं। संवेदना बढ़ती गई और मैं नेत्रदान के विषय में सोचने लगी। कल्पना करने लगी उस स्थिति की जब मेरी आँखों से कोई और देख पाएगा। यह सोच कर ही गौरवान्वित हो गई।
तभी ध्यान आया अपनी नानी जी का। उन्होंने अपनी आँखें दान की थीं या यह कहिए कि परिवार वालों ने मृत नानी की जीवित आँखें दान की थीं। यह सोच कर भी बहुत अच्छा लगा और तभी मेट्रो में बैठे बैठे मैं सोचने लगी कि इसका मतलब यह हुआ कि मेरी नानी की आँखें अभी भी इस दुनिया में हैं और कोई दो अलग अलग लोग उनसे यह दुनिया देख रहे हैं। दो लोग इसलिए क्योंकि अकसर एक व्यक्ति को एक ही आँख लगाई जाती है।

दो व्यक्ति नानी की आँखों से देख रहे होंगे यह सोचते ही मेरी संवेदना ने करवट ली और मैं उन अंजान व्यक्तियों के बारे में सोचने लगी जो नानी जी की आँखों से देख रहे होंगे। मुझे एकदम लगा कि क्या पता उन दो व्यक्तियों में से कोई एक अमेरिका आ गया हो। बस में, मेट्रों में सड़क पार करते हुए मैं इतने सारे भारतीयों को हर रोज़ देखती हूँ, शायद उनमें से कोई वही हो जो मेरी नानी की आँख से देख रहा हो।

यह कल्पना करते ही मैं अपने सामने से गुज़रने वाले हर भारतीय का चेहरा याद करने लगी। मैं याद करने लगी अपनी नानी की आँखों का रंग, आकार, कोमलता। अचानक से लगा कि सब छोड़छाड़ कर अपनी मृत नानी की आँखों की तलाश आरम्भ कर दूँ। एक ऐसी अद्भुत आशा ने जन्म लिया कि मैं पल में उत्साहित हो गई। ऐसी आशा जो शायद संवेदना के साथ ही उभरती है। सोचने लगी कि शायद इतने बड़े शहर में कहीं मेरी नानी की निरीह प्रेम युक्त भूरी आँखें मुझे देख रही होंगी।

अचानक आँखों के सामने से एक और नेत्रहीन व्यक्ति गुज़रा और मैंने यर्थाथ का सामना किया। मुझे हैरानी हुई अपनी सोच पर। मैं कुछ क्षणों के लिए सचमुच नानी जी की आँखों की खोज के लिए तत्पर हो गई थी। वह नानी जो कई साल पहले ही किसी दूसरे लोक में जा चुकी हैं। वह लोक जो अमेरिका से भी कहीं अधिक दूर है। उन्हें तो पता भी नहीं है कि मैं दिल्ली से दूर, इतनी दूर बैठी हूँ।

अपनी बचकानी आतुरता को देख मेरी आँखें भर आईं। उस क्षण अपने अंदर के खालीपन को महसूस किया। चाहे नए दोस्त, नया घर, नई नौकरी कितनी ही अच्छी क्यों न हो पर विदेश में अपने किसी का अहसास ही मुझे इतना आतुर कर सकता है यह सोचा नहीं था। फिर चाहे वो मृत नानी की आँखें ही क्यों न हों!

अपनी जड़ों के पास जाने की इच्छा अचानक बलवती हो गई, नानी जी के घर का आँगन मानो मुझे पुकारने लगा पर मेट्रो रुक गई। मेरा स्टेशन आ गया, घर तक जाने वाली बस का समय दिखने लगा, विदेश में रहने की बाध्यता ने मेरा ध्यान आकर्षित किया, मैंने अपनी संवेदना को थोड़ा अपने से दूर झिड़क दिया और फिर सुबह से शाम, शाम से रात और फिर विदेश में सुबह का सिलसिला आरम्भ हो गया।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें