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| 11.22.2007 |
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चूल्हा |
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कुछ ईंट और मिट्टी से, बन तो जाता है चूल्हा
पसीना मेहनत का लिपो, उम्र पाता है चूल्हा। यूँ कोई, कहीं आग, लगा सकता है लेकिन लगाना आग करीने से, सीखाता है चूल्हा। कब आँच करनी तेज, कब करनी है धीमी पहचानना रुख हवा का, सिखाता है चूल्हा। घर-बार चलता जब-तक, जलता है चूल्हा खुद जलकर आग पेट की, बुझाता है चूल्हा। पौ फटते ही जिस घर में, जलता हो चूल्हा है दाना उस घर में, यह बताता है चूल्हा। जिस दिन किसी घर में, जला न हो चूल्हा मातम का सन्देश भी, सुनाता है चूल्हा। चूल्हे में मारे फूकनी, जब जोर से गोरी घूँघट में छिपे रूप को, दमकाता है चूल्हा। |
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