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05.26.2007
 
उसको देखना चाहूँ
अशोक वशिष्ट

सूरज देखूँ, चंदा देखूँ और तारों को देखूँ,
लेकिन इनमें वो न दिखता, क्यों सारों को देखूँ?

मैं तो उसको देखना चाहूँ, जो इस मनमें रहता,
इन होंठों पे, इन आँखों में, हर धड़कन में रहता,
उस बिन सबके सब मुर्दे हैं, मुरदारों को देखूँ।

मैं तो उसको देखना चाहूँ, जो दिखते न दिखता
मैं तो उसको देखना चाहूँ, जो सुनते न सुनता‚
किन आँखों से, उसको उसके, उपकारों को देखूँ।

मैं तो उसको देखना चाहूँ, जो हम सबसे खेले,
मैं तो उसको देखना चाहूँ‚ जो इस जगसे खेले,
हरपल खेले, हरपल जीते, क्यों हारों को देखूँ?

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