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| 07.28.2007 |
| तू जो साथ तो अशोक वशिष्ट |
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तू जो साथ तो जीवन जन्नत,
नहीं साथ तो जीवन ज़िल्लत। तू जो साथ तो सब कुछ सुंदर, नहीं साथ तो सब असुंदर। तू जो साथ तो मौत भी दुल्हन, नहीं साथ तो मौत ही तड़पन। तू जो साथ तो खंडहर मंदिर, नहीं साथ तो मंदिर खंडहर। तू जो साथ तो सब कुछ अपना, नहीं साथ तो सब कुछ सपना। तू जो साथ तो मैं हूँ पूरा, नहीं साथ तो मैं अधूरा। तू जो साथ तो हर क्षण मुक्ति, नहीं साथ तो कहीं न मुक्ति। |
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