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07.28.2007
 
सुंदर उपहार
अशोक वशिष्ट

प्रभुजी तुमने जगत बनाकर, हमसब पर उपकार किया है,
हमको सुख, सुविधा, मस्ती का, इक सुंदर उपहार दिया है।

सूरज, चंदा और तारों से, अंबर का सिंगार किया है,
फल, फूल, पेड़ों, नदियों का, धरती को परिवार दिया है।

नर और नार बनाकर तुमने, इस जगका विस्तार किया है,
सबको प्यार का जाम पिलाकर, जीने का अधिकार दिया है।

रंग, रूप और सुंदरता का, इक सुंदर संसार दिया है,
सबको सबके अनुसार ही, कुछ न कुछ आकार दिया है।

तुमने जो, सोचा जो चाहा, उसको ही साकार किया है,
पहले सबको जन्म दिया फिर, मात पिता का प्यार दिया है।

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