अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
11.05.2007
 
रूह को मौत नहीं आती
अशोक वशिष्ट

बहुत धुआँ है, कहीं आग जल रही होगी,
किसी की रूह, कहीं पे पिघल रही होगी।

सुना है रूह को तो मौत ही नहीं आती,
नये रूप में, कहीं वो टहल रही होगी।

यहाँ से उठ गये जो, कहाँ पे जा बसे हैं?
उस जहान में, अपनी चर्चा चल रही होगी।

रूह को हर रूह की पहचान होती है,
कहीं जुदा होकर, कहीं पे मिल रही होगी।

किसी की मौत पे अश्क बहाना ठीक नहीं,
रूह खुदसे या, खुदा से मिल रही होगी।

अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें