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| 12.30.2007 |
| परेशान है आदमी अशोक वशिष्ट |
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खुदही से परेशान सा, लगता है आदमी,
आप अपनी मौत के दिन, गिनता है आदमी। इतनी ख़्वाहिशें हैं, कि पाना नहीं है आसां, तड़पता बहुत है अंत में, मरता है आदमी। जमीं पे रहके चाँद, पाने की आरज़ू है, ऐसे ही ख़्वाब देखता, रहता है आदमी। सूरज तो सामने है, रोशन चिराग करता, यूँ ही पत्थरों के आगे, झुकता है आदमी। सामने ख़ुदा है पर, वो आसमाँ में ढूँढे, उठता है आदमी कि ये, गिरता है आदमी? अब आदमी में आदमी, बिल्कुल नज़र न आए, आख़िर ये किस जहान में, बसता है आदमी? |
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