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| 07.28.2007 |
| हुनर सीख लिया अशोक वशिष्ट |
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मैंने हर दर्द को सहने का हुनर सीख लिया,
मैंने मुश्किल में भी रहने का हुनर सीख लिया। लोग जख्मों से परेशान से हो जाते हैं, मैंने जख्मों को सहने का, हुनर सीख लिया। अब जहर हो या अमृत हो, कोई फर्क नहीं, मैंने दोनों को ही चखने का हुनर सीख लिया। अब मुझे चाँद, सितारों पे नहीं जाना , मैंने धरती पे ही उड़ने का हुनर सीख लिया। मुझे जन्नत से या दोजख से कोई ख़ौफ़ नहीं, मैंने दोनों में ही बसने का हुनर सीख लिया। जिसको तू ढूँढता रहता है बहुत दूर कहीं, उसको अपने में ही तकने का हुनर सीख लिया। |
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