अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
05.26.2007
 
अच्छा नहीं है लगता
अशोक वशिष्ट


तेरी नजर से गिरकर जीना, अच्छा नहीं है लगता,
दुनिया से डर डरकर जीना, अच्छा नहीं है लगता।

खुशियों की खातिर बिक जाऊँ, अच्छा नहीं है लगता,
स्वर्ग की खातिर, मरकर जीना, अच्छा नहीं है लगता।

अपनी खुशियाँ जगमें ढूँढूँ, अच्छा नहीं है लगता,
झूठ की मिन्नतें, करकर जीना, अच्छा नहीं है लगता।

रूह को मैं बस, बदन समझ लूँ, अच्छा नहीं है लगता,
सच से आँखें, फेरकर जीना, अच्छा नहीं है लगता।

स्वामी तुझसे दूर रहूँ ये, अच्छा नहीं है लगता,
तेरे बिन, मर मरकर जीना, अच्छा नहीं है लगता।

अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें