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ISSN 2292-9754

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03.13.2015


उत्तराखंड के अनदेखे पर्यटक स्थल... माँ पुण्यागिरि देवी

अपने एक आलेख में मैंने बताया था कि इस वर्ष ग्रीष्मावकाश का पहला दिन किस तरह जनपद पीलीभीत से कुछ किलोमीटर दूरी पर स्थित उत्तराखंड राज्य के कस्बे टनकपुर में बिताया और वहाँ के अनदेखे भ्रमण योग्य स्थलों को खोजकर आनंद उठाया। नेपाल के एक छोटे से कस्बे ब्रह्मदेव में उपलब्ध सौंदर्य प्रसाधन तथा विदेशी सामानों की सूची ने (सभी संबंधितों से क्षमा याचना सहित) मेरी धर्मपत्नी के लिये इस यात्रा के इस पड़ाव को बहुत रोचक और उत्साह प्रधान बना दिया था। प्रातःकाल उठकर स्नानादि से निवृत होने के बाद जब आगे के मार्ग के बारे में पड़ताल की तो मालूम हुआ कि बीती रात पहाड़ों पर हुई बारिश के कारण टनकपुर से माँ पुण्यागिरि के मंदिर तक के लगभग बीस किलोमीटर के मार्ग में दो तीन स्थानों पर बड़ी-बड़ी चट्टानें तथा दलदली अवरोध आ गये हैं जिनमें एक बस यात्रियों सहित फँस गयी थी जिसे बड़े प्रयासों के बाद निकाला जा सका है। स्वाभाविक तौर पर टनकपुर से आगे का मार्ग वाहनों के लिये प्रतिबंधित कर दिया गया है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु पैदल ही देवी माँ के दर्शनों हेतु आगे बढ़ रहे थे। यह नज़ारा देख एक बार मंदिर की यात्रा को टालने की इच्छा हुई परन्तु संयोग से जनपद जे.पी.नगर से आये मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट श्री रामनारायण जी नज़र आये। वे भी बच्चों सहित माँ के दर्शन की इच्छा से वहाँ आये थे परन्तु ऐसी हालात देखकर वे भी जाने का उपक्रम बना रहे थे। हम दोनों के परिवारों को असमंजस में देखकर चैकिंग पर तैनात पुलिस अधिकारी ने स्थानीय थाने के दो सिपाहियों को बुलाकर बीच के मार्ग में फँसे छोटे वाहन जीप की व्यवस्था करवाते हुये कहा कि- "अब जब आप लोग दर्शन की इच्छा से आये हैं तो बिना दर्शन के जान उचित न होगा।"

पुण्यागिरि माँ दर्शन मार्ग उत्तराखंड की आरंभिक पहाड़ियों की तलहटी में बसा कस्बा टनकपुर भूस्खलन के कारण क्षतिग्रस्त पुण्यागिरि दर्शन मार्ग

इसके बाद स्थानीय पुलिस की सहायता से हम दोनों के परिवार लगभग आठ किलोमीटर की यात्रा जीप से करने के बाद उस स्थान पर पहुँचे जहाँ भारी मात्रा में दलदली मलबा आने से मार्ग अवरुद्ध हो गया था। लगभग पाँच सौ मीटर की यह यात्रा पैदल करने के बाद हमें फिर एक और जीप में बैठकर कुछ किलोमीटर की यात्रा करनी थी। अबकी बार वह जीप हमें पुलिस चौकी टुलीगाढ़ तक ले आयी। यहाँ भी कुछ मीटर पैदल चलने के बाद एक और जीप हमें भैरवघाटी तक ले गयी। सामान्य परिस्थितियों में यहाँ तक आवागमन का साधन उपलब्ध रहता है।

यहाँ से माँ के मंदिर तक की लगभग चार किलोमीटर की यात्रा चढ़ाई भरे मार्ग पर पैदल ही पूरी करनी थी। पूरे मार्ग में जगह-जगह यात्रियों के ठहरने के विश्राम स्थल बने थे जहाँ सुकून से बैठकर कुछ देर विश्राम करने के उपरांत फिर आगे बढ़ना होता था। भैरवघाटी से नाईबाड़े तक की यात्रा में अनेक दुकानों पर लिखा मिला कि यह आखिरी दुकान है परन्तु वह आखिरी नहीं थी। यह लिखे जाने का आशय मेरी समझ से परे था।

क्षतिग्रस्त मार्ग से गुजरते दर्शनारर्थीगण ठूलीगाड पुलिस रिपोटिंग चौकी जहां से पैदल यात्रा मार्ग प्रारंभ होता है सिद्ध पीठ माँ पुण्यागिरि मंदिर प्रवेश मार्ग

धीरे-धीरे चढ़ते हुये अंत में एक चट्टानी पहाड़ पुण्यागिरि आया जिसके शीर्ष पर माता का मंदिर स्थित है। वहाँ तक पहुँचने के लिये चट्टान को काटकर एक संकरा मार्ग बनाया गया है जिसे दो भागों में विभाजित किया गया है जिससे दर्शन हेतु जाने वाले और दर्शनों के उपरांत लौटने वाले दर्शनार्थियों का मार्ग पृथक-पृथक हो जाता है। इससे चढ़ने और उतरने वाले दर्शकों के लिये सुविधा रहती है।
इस चढ़ाई के मार्ग पर धर्ममत्नी का हाथ थामे जब मैं शीर्ष पर स्थित माँ के मंदिर तक पहुँचा तो असीम आनंद की प्राप्ति हुयी। यह स्थल एक चट्टानी पर्वत पुण्यागिरि के शीर्ष पर अधिकतम् पाँच गुणे दस का चौरस स्थल के रूप में है जिस पर एक गर्भस्थल के ऊपर शक्तिरूपिणी माँ का एक छोटा सी मंदिर बना है। यहाँ चट्टान के शीर्ष पर स्थित इस मुख्य मंदिर में बामुश्किल दस से बीस लोगों के खड़े रहने लायक ही स्थान है।

मंदिर के पैदल प्रवेश मार्ग पर दर्शनों को जाते दर्शनारर्थीगण पर्वत के शिखर पर स्थित माँ पुण्यागिरि के मंदिर का विहंगम दृष्य माँ पुण्यागिरि के मंदिर के गर्भग्रह प्रांगण का विहंगम दृष्य

दर्शन और पूजापाठ करने के उपरांत हमने वापिस भैरव घाटी की ओर यात्रा आरंभ की। अब तक आसमान में बादल फिर से छा चुके थे। इस कारण सूरज की चिलचिलाती धूप हमारी यात्रा में खलल डालने नहीं आ सकती थी। लौटते हुये मार्ग के बीच में काली माँ के एक मंदिर के रूप में एक छोटी विश्राम स्थली हैं जहाँ रुककर काली माँ को भेंट स्वरूप बलि के प्रतीक के रूप में नारियल फोड़े जाने का विधान है। यह नारियल काली माँ की मूर्ति के समीप इस निमित्त बनी एक चट्टान पर पर पटककर फोड़ा जाता है। नारियल से निकलने वाले जल को काली माँ को अर्पित करने के बाद एक काल झंडा तथा काली उरद की खिचड़ी चढ़ाई जाती है। सभी तीर्थ यात्री इसे एक परंपरा के रूप में स्वीकार करते हुए ऐसा करते हैं। मैने परंपरा का निर्वहन करने के साथ थोड़ा सा तार्किक होते हुये यह पूछने की जुर्रत की कि यह परंपरा क्यों है? परन्तु मंदिर में उपलब्ध पंडितजी, दुकान लगाकर यह सामग्री बेचने वाले ढेरों दुकानदारों में से कोई भी इसका उत्तर नहीं दे सका। मेरा मानना है कि किसी भी धर्मस्थल पर निर्धारित कोई भी परंपरा अनायास नहीं होती, उसके पीछे कोई न कोई तार्किक आधार अवश्य होता है सो आप सभी सुधी पाठकों के लिये इसका उत्तर खोजने का विकल्प सुरक्षित करते हुये नाईबाड़ा से अपनी यात्रा के अगले पड़ाव भैरव घाटी की ओर बढ़ चले।

भैरों घाटी में काल भैरव के दर्शनों को बगैर यात्रा को अधूरी मानी जाती है। इसके दर्शन करने के बाद टुलीगाढ़ पुलिस चौकी पहुँचे तब तक हलकी-हलकी बूँदा-बांदी होने लगी थी और फिर वहाँ से वही दलदली मलबे वाला मार्ग, बीच में फँसे छोटे वाहनों का चक्कर लगाने का दौर और अंततः हम वापिस टनकपुर आ गये। यहाँ पहुँचकर जे.पी.नगर से आये मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट श्री रामनारायण जी व उनके परिवार से विदा ली जिन्हें रात्रि में ही बरेली निकल जाना था। मैं अपने परिवार सहित रात्रि विश्राम हेतु स्थानीय विश्राम गृह में आ गया और अगली सुबह जल्दी निकलने के बारे में सोचते हुए जल्दी से बिस्तर तक जा पहुँचा क्योंकि अगला दिन हमारे विवाह की इक्कीसवीं वर्षगांठ का दिन जो था।


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