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ISSN 2292-9754

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03.13.2018


अभिशप्त बौद्धनगर और विषहरी देवी का मंदिर

हमारे अपने आसपास न जाने कितनी ऐतिहासिक विरासतें पडी हैं जिन्हें हम जानते तक नहीं। एक ऐसी ही ऐतिहासिक विरासत से पिछले दिनों रूबरू हुआ जब एक अधिवक्ता मित्र के आह्वान पर फर्रूखाबाद स्थित नीम करोरी बाबा के दर्शन करने गया। उन्होंने नीब करोरी तपस्थली की महत्ता के बारे में तो बताया था परन्तु इस स्थान के दर्शनों के उपरांत निकट स्थित बौद्ध पर्यटन स्थल तक जाने का मोह त्याग नहीं सका।

फर्रूखाबाद के नीम करोरी नामक स्थान से मात्र 9किलोमीटर की दूरी पर स्थित है बौद्ध तीर्थ संखिसा।

यहाँ पहुँच कर इस स्थल की पौराणिकता की पड़ताल की तो जो आश्चर्यजनक तथ्य सामने आये उन्हें जानकर आप भी कौतूहल से भर उठेंगे। पाँचवीं सदी में आये प्रसिद्ध चीनी यात्री फाहियान ने अपने यात्रा वृतांत में संखिसा में वि़द्यमान सम्राट अशोक के 70फुट ऊँचे स्तम्भका उल्लेख करते हुये लिखा है कि इसका रंग बैंगनी था तथा यह इतना चमकदार था कि जल से भीगा जान पडता था। समय के साथ वह स्तम्भ धूल धूसरित हो गया है।

भौगोलिक रूप से यह स्थान संखिसा जनपद फर्रूखाबाद में आता है परन्तु यह प्रसिद्ध नीम करौरी महाराज के दरबार के पास ही स्थित है।

अब थोडी सी नज़र इस स्थल की उस पौराणिक महत्ता पर जो इसे हिन्दू धर्म की महान परंपरा के वाहक कुछ पात्रों से जोड़ती है। प्राचीन भारत के 16महा जनपदों में से एक पाँचाल जनपद भी था जिसका विस्तार उत्तर प्रदेश में फर्रूखाबाद बरेली बदायूं से लेकर यह कानपुर से बनारस के बीच गंगा के मैदान तक में था। इसमें उत्तरी और दक्षिणी पाँचान नामक दो उपभाग थे जिनमें से दक्षिणी पंचाल की राजधानी कम्पिल थी जो वर्तमान में फर्रूखाबाद जनपद का नगर है। इसी दक्षिणी पाँचाल जनपद में एक प्रसिद्ध बौद्धकालीन नगर स्थित था नाम था संकाश्य। इस संकाश्य का उल्लेख बाल्मीकि रामायण में इस रूप में आता है कि सीता से विवाह की इच्छा से यहाँ के नरेश सुधन्वा ने मिथिला पर आक्रमण कर जनक को हराना चाहा परन्तु युद्ध में मारा गया और जनक ने अपने भाई कुशध्वज को संकाश्य का नरेश बना दिया था। इन्हीं कुशध्वज की पुत्री उर्मिला से लक्ष्मण जी का विवाह हुआ था।

गौतम बुद्ध के काल में भी संकाश्य एक ख्याति प्राप्त नगर था। इसे वर्तमान में संखिसा (बहिरगढ) के नाम से जाना जाता है। पालि ग्रंथ 'अभिधानप्पदीपिका'में संकस्स (सांकाश्य) की उत्तरी भारत के बीस प्रमुख नगरों में गणना की गई। यह स्थल

बुद्ध के जीवन में घटित चार प्रमुख घटनाओं में से एक का साक्षी भी रहा है। पाली लोक कथाओं में कहा गया है कि तीन सीढ़ियों के द्वारा भगवान बुद्ध स्वर्ग से यहीं पर अवतरित हुये थे। इस दंतकथा के कारण संखिसा को बौद्ध धर्म अनुयायी एक तीर्थ स्थल मानते हैं। बौद्ध धर्म में यह विश्वास किया जाता है कि भगवान बुद्ध तीन माह के लिये स्वर्ग में अपनी स्वर्गीया माता से मिलने प्रवास पर गये थे और अपने प्रवास से लौटने के उपरांत काली नदी के तट बसे इसी टीले वाले स्थान पर उतरे थे। स्वर्गारोहण से धरती पर उतरने के लिये जिन तीन सीढ़ियों का उपयोग उन्होंने किया था उस स्थान पर एक विशाल स्तूप का निर्माण कराया गया जो अब मात्र टीले के रूप में ही विद्यमान है।

कहा जाता है कि बौद्ध धर्म में स्त्रियों को भिक्षुणी के रूप में सम्मिलित होने पर पाबंदी थी परन्तु भगवान बुद्ध के एक प्रिय शिष्य आनन्द स्त्रियों के प्रति उदार दृष्टिकोण रखते थे और चाहते थे कि भगवान बुद्ध स्त्रियों को भी बौद्ध संघ का सदस्य बनने की अनुमति दें और उन्हें भी बौद्ध भिक्षुणी के रूप में मान्यता दी जाय। भगवान बुद्ध ने अपने प्रिय शिष्य की इच्छा का सम्मान करते हुये सर्वप्रथम संखिसा में ही यह अनुमति प्रदान की और प्रसिद्ध भिक्षुणी उत्पलवर्णा को दीक्षा देकर स्त्रियों के लिये भी बौद्ध संघ में प्रवेश का मार्ग खोल दिया।

इस स्थान की ऐतिहासिकता का एक और प्रमाण यहाँ सम्राट अशोक द्वारा स्थापित कराये गये 70 फुट ऊँचे स्तम्भ का होना भी रहा है। चीनी यात्री फाहियान के द्वारा अपने यात्रा वृत्तांत में इसका उल्लेख किया गया है और यह अंकित किया है कि बैंगनी रंग का यह स्तम्भ इतना चमकदार है कि यह जल से भीगा जान पड़ता है।

समय के साथ जब भारत में बौद्ध धर्म का पतन प्रारंभ हुआ तो उसके लिये इस संघ में स्त्रियों को भिक्षुणी के रूप में प्रतिभाग करने की अनुमति को ही प्रमुख रूप से दोष दिया गया। हालाँकि बौद्ध धर्म का पतन भारतीय इतिहास के सर्वाधिक विवादस्पद विषयों में से एक है, "विनय पीटक" में ब्रह्मचर्य के पतन और धर्म के अप्रत्याशित विध्वंस के बारे में उल्लेख किया गया है।

....शनै शनै बौद्ध धर्मावलम्बियों द्वारा निर्मित स्तूप व अन्य प्रतीक नष्ट होते चले गये। पाली किंवदंती मे वर्णित महात्मा बुद्ध के स्वर्गारोहण की तीन सीढ़ियाँ वाला पवित्र स्थान भी नष्ट हो गया परन्तु इस समूची ऐतिहासिकता के साक्षी रहे धरोहरों के ध्वंसावशेष समूचे क्षेत्र में बिखरे रहे। कालान्तर में इस स्थान पर देवी माँ का एक मंदिर स्थापित हो गया और उसे नाम दिया गया 'विषहरी देवी का मंदिर'।

कदाचित यह नाम इसलिये दिया गया कि स्त्रियों को बौद्ध धर्म में भिक्षुणी बनाने के कारण जो विष फैला वह अंततः बौद्ध धर्म के पतन का कारण भी बना।

अपनी वर्तमान भौगोलिक प्रास्थितियों में यह स्थल उत्तर प्रदेश के जनपद र्फरूखाबाद मे स्थित है परन्तु जनपद के नीब करोरी अधिक संनिकट है। अपने आप में ऐतिहासिकता को समेटे हुये यह पुरातात्विक धरोहर प्रदेश के पर्यटन मानचित्र पर अपना विशेष स्थान रखता है।


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