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02.18.2009
 

माँ की डिग्रियाँ
अशोक कुमार पाण्डेय


घर के सबसे उपेक्षित कोने में
बरसों पुराना जंग खाया बक्सा है एक
जिसमें तमाम इतिहास बन चुकी चीजों के साथ
मथढक्की की साड़ी के नीचे
पैंतीस सालों से दबा पड़ा है
माँ की डिग्रियों का एक पुलिन्दा
बचपन में अक्सर देखा है माँ को
दोपहर के दुर्लभ एकांत में
बतियाते बक्से से
किसी पुरानी सखी की तरह
मरे हुए चूहे सी एक ओर कर देतीं
वह चटख पीली लेकिन उदास साड़ी
और फिर हमारे ज्वरग्रस्त माथों सा
देर तक सहलाती रहतीं वह पुलिन्दा
कभी क्रोध कभी खीझ
और कभी हताश रूदन के बीच
टुकड़े-टुकड़े सुनी बातों को जोकर
धीरे-धीरे बुनी मैंने साड़ी की कहानी
कि कैसे ठीक उस रस्म के पहले
घण्टों चीखते रहे थे बाबा
और नाना बस खड़े रह गये थे हाथ जोकर
्माँ ने पहली बार देखे थे उन आँखों में आँसू
और फिर रोती रही थीं बरसों
अक्सर कहतीं
यही पहनाकर भेजना चिता पर
और पिता बस मुस्कुराकर रह जाते...
            डिग्रियों के बारे में तो
                       चुप ही रहीं माँ
बस एक उकताई सी मुस्कुराहट पसर जाती आँखों में
जब पिता किसी नए मेहमान के सामने दुहराते
           ’उस जमाने की एम.ए. हैं साहब
           चाहतीं तो कालेज में होतीं किसी
           हमने तो रोका नहीं कभी
           पर घर और बच्चें रहे इनकी पहली प्राथमिकता
           इन्हीं के बदौलत तो है यह सब कुछ’

बहुत बाद में बताया नानी ने
कि सिर्फ कई रातों की नींद नहीं थी उनकी कीमत
अनेक छोटी-बडी लड़ाईयाँ
दफ्न थीं उन पुराने कागजों में...
आठवीं के बाद नहीं था आसपास कोई स्कूल
और पूरा गाँव एकजुट था शहर भेजे जाने के खिलाफ
उनके दादा ने तो त्याग ही दिया था अन्न-जल
पर निरक्षर नानी अ गयी थीं चट्टान सी
और झुकना पड़ा था नाना को पहली बार
अन्न-जल तो खैर कितने दिन त्यागते
पर गाँव की उस पहली ग्रेजूएट का
फिर मुँह तक नहीं देखा दादा ने

डिग्रियों से याद आया
ननिहाल की बैठक में टँगा
वह धूल-धूसरित चित्र
जिसमें काली टोपी लगाये लम्बे से चोगे में
बेटन सी थामे हुए डिग्री
माँ जैसी शक्लोसूरत वाली
एक लकी मुस्कुराती रहती है
माँ के चेहरे पर तो
कभी नहीं देखी वह अलमस्त मुस्कान
कॉलेज के चहचहाते लेक्चर थियेटर में
तमाम हमउम्रों के बीच कैसी लगती होगी वह लकी?
क्या सोचती होगी
रात के तीसरे पहर
इतिहास के पन्ने पलटते हुए?
क्या उसके आने के भी ठीक पहले तक
कालेज की चहारदीवारी पर बैठा
कोई करता होगा इंतजार?
(जैसे मैं करता था तुम्हारा)
क्या उसकी कताबों में भी
कोई रख जाता होगा
सपनों का महकता गुलाब?

परिणामों के ठीक पहले वाली रात
क्या हमारी ही तरह धकता होगा उसका दिल?
और अगली रात
पंख लगाये डिग्रियों के उता होगा उन्मुक्त...
जबकि तमाम दूसरी लकियों की तरह
एहसास होगा ही उसे
अपनी उम्र के साथ गहराती जा रही पिता की चिन्ताओं का
तो क्या परीक्षा के बाद किताबों के साथ
ख़ुद ही समेटने लगी होगी स्वप्न?
या सचमुच इतनी सम्मोहक होती है
मंगलसूत्र की चमक और सोहर की खनक
कि आँखों में जगह ही न बचे किसी अन्य दृश्य के लिए?

पूछ तो नहीं सका कभी
पर प्रेम के एक भरपूर दशक के बाद


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