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ISSN 2292-9754

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07.12.2014


बिजली चमकने का रहस्य?

ख़ुदा जब देता है तो छप्पर फाड़ कर देता है और जब लेता है तो वह भी अपने तरीके और मर्ज़ी से! मनुष्य चाहे जितनी भी योजनायें बना ले या सपने सजा ले, होता वही है जो मंजूरे ख़ुदा होता है।

गाँव का एक किसान पिछले कई महीनों से मेहनत कर रहा था। सुबह शाम अपनी एक करके उसने अपनी ज़मीन को नई फसलों के लिए तैयार किया। सही वक़्त पर उसमें बीज और खाद डाली और उसे पानी से सींचा।

धीरे-धीरे उसे अपनी मेहनत का फल नज़र आने लगा था। बीज के अंकुर जब फूटे तो नन्हें-नन्हें पौधे ज़मीन से निकल आये और उसके देखते-ही देखते खेतो में ख़ुशहाली से लहलहाने लगे। चारों और हरियाली ही हरियाली और किसान के मन में एक उम्मीद की लहर फैल गई।

किसान जब भी अपनी लहलहाती फसलों को देखता तो फूला न समाता था। उसकी ख़ुशी उसकी आँखों में चमकती स्पष्ट दिखाई देती थी, न जाने कितने ही सपने वह अपने मन में सँजोता और फिर एक दिन उन्हे साकार करने वाले दिन की कल्पना में खो जाता। आने वाले दिनों में न जाने कितने सपने उसने अपने मन में सँजो लिए थे।

एक दिन शाम के वक़्त अपने खेतों से जब वह घर लौटा तो खाना खाने के समय अपनी पत्नी से उसने अपना एक सपना सांझा किया, "भागवान, इस बार म्हारी जो फसल होवेगी वह कमाल की होगी...पिछले कई सालां से जो नए घर बनाने की हमारी तमन्ना रही है वह भी इस साल पूरी हो जावेगी। घर ऐसा बनाऊँगा कि सब अपनी आँखें फाड़ कर देखते के देखते रह जाएँगे और बेटी की शादी भी इसी साल ऐसी करेंगे कि जैसे किसी शहज़ादी की शादी होती है...!"

"तुम्हारे मुँह में घी शक्कर!" कहते हुये किसान की पत्नी भी फूली नहीं समाई।

धीरे-धीरे अब वह समय नज़दीक आता जा रहा था जब मक्की की फसल पक कर तैयार होने को आई था। किसान अब चौबीसों घंटे अपनी फसल को लोगों और जानवरों आदि से बचाने में लग गया था। दिन के बाद रातों में भी वह अपने खेतों पर ही रहने लगा था। किसान की पत्नी सुबह शाम खेत पर ही स्वयं जाकर उसे उसका खाना दे आती थी।

कितने ख़ुश थे दोनों अपनी लहलहाती मकई की फसल को देख कर।

"बस, दो दिन की और बात है, भागवान! सोमवार से फसल की कटाई शुरू और फिर देखना, फसल बेचकर जो पैसे इस बार मिलेंगे उससे हमारी किस्मत बदल जायेगी, हमारे सब सपने साकार होंगे.!" कहते-कहते किसान ने अपनी असीम ख़ुशी का एक बार फिर इज़हार किया।

कल सुबह फसल काटने का दिन था। किसान की पत्नी हर रोज़ की तरह अपने पति के लिये रात का भोजन देने के लिये गई तो मौसम ख़राब होने की व्ज़ह से घर लौट नहीं पाई। देखते ही देखते आसमान पर काली घटाएँ छा गईं, मूसलाधार बारिश होने लगी। सहसा, एक सामान्य शाम घनघोर काली और डरावनी रात्रि मे बदल गई थी।

बारिश थी कि रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी और न ही उसके रुकने के कोई आसार ही नज़र आ रहे थे। सहमी सी, चिंताजनक हालत में किसान की पत्नी उसकी बगल में, ऊपर मचान पर पड़ी थी।

सहसा, सिर पर एक ज़ोर की गडगड़ाहट हुई जैसे कोई पानी का बादल फटा हो। तेज़ बारिश के साथ अँधेरी और झखड़ का आलम हो गया। किसान ने उठकर, दूर तक अपने खेतों पर अपनी एक सरसरी नज़र दौड़ाई। अपने इर्द-गिर्द तबाही का दृश्य देखकर वह अपना सिर पकड़ कर बैठ गया।

...और फिर बादल गरजने के बाद बिजली को चमकता देखकर किसान की पत्नी अनायास अपने पति से पूछ ही बैठी - "बादलों की यह गर्जन तो समझ में आ रही है लेकिन यह बिजली क्यों चमक रही है?"

जवाब में किसान फूट पड़ा, "भागवान, ईश्वर अपनी 'फ्लैश लाईट' जलाकर देख रहा है कि मुझ गरीब का कोई पौधा पानी में डूबने से तो नहीं रह गया।"


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