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ISSN 2292-9754

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09.23.2014


अंतर

अनिता अपने बालों को कंघे से सँवारती हुई अपने मुख पर एक अनजानी सी उदासी लिए न जाने किस सोच में डूबी थी। अतीत की मधुर स्मृतियों के अथाह सागर में वह इतना डूबी थी कि उसे कुछ ख़बर न थी कि कंघा उसके बालों में कब रुक कर रह गया था!

आज की सुबह अनिता के लिए कुछ दुखदाई और अविस्मरणीय स्मृतियाँ लेकर आई थी। सहसा, उसका ध्यान अपने माथे पर लगी बिंदी पर गया और फिर उसने अपने बालों में सुहाग की निशानी सिंदूर को अपनी उँगलियों के स्पर्श से महसूस किया।

आनंद अनिता के लिये एक ग़ैर बन चुका था, चूँकि वह आज किसी दूसरे की हो चुकी थी। वैवाहिक बंधनों में एक बार बँध जाने के बाद आनंद को याद करना अथवा उसका नाम लेना भी उसके लिये गुनाह था। उसके दिलो-दिमाग में आनंद की यादें इतनी प्रबल हो चुकी थीं कि वह बड़बड़ाने लगी - कैसा होगा वह? क्या उसे कभी मेरी भी याद आती होगी या फिर मैं ही पागल..? तभी कोई दूसरा विचार उसको थोड़ा सकून देता ... आनंद ने अब तक तो किसी अच्छी सी लड़की ढूँढ कर शादी कर ली होगी और मुझे उसने माफ़ कर दिया होगा। मुझे भूल गया होगा अब तक वह। इसी अंतरदवंद से पीड़ित अनिता दुनिया से बेख़बर बालकनी में बैठी थी।

यद्यपि अनिता आनंद को दिल से अपनाना चाहती थी और उसे अपना जीवन-साथी भी मान चुकी थी तथापि समय और हालातों के आगे उसे अपने घुटने टेकने पड़े थे। संयोगवश, अनिता की शादी उसी शहर में हुई थी जहाँ आनंद रहता था, लेकिन आनंद को इस बात का ज्ञान न था।

अनिता को जब कभी भी अपने पति रमेश की याद आती तो आनंद के साथ बिताये अपने कुछ लम्हों को याद कर उसके दिलो-दिमाग में उष्णता भर जाती। अनिता शिमला में एक सरकारी बैंक की मुलाज़िम थी। शादी के बाद अपना तबादला अभी न होने के कारण वह अभी अपने मायके में ही रह रही थी।

शादी की पहली रात जब उसके पति रमेश ने उसे अपने आगोश में लेना चाहा तो तब उसे लगा जैसे कि आनंद उसी कमरे में कहीं छिपा बैठा है। लाख चाहने पर भी अनिता आनंद को बिसरा नहीं पाई थी।

सहसा, अतीत की एक मुलाक़ात उसे याद हो आई। सप्ताह के अंत में आनंद अनिता से मिलने शिमला आया हुआ था। मिलने की जगह ‘गुफा रैस्टौरेंट’ थी। स्टेशन पर पहुँच कर आनंद ‘माल रोड’ की तरफ बढ़ने लगा था। उसे ‘गुफा रैस्टौरेंट’ तक पहुँचने में लगभग आधा घंटा लगा था जहाँ अनिता पहले से ही उसका इंतज़ार कर रही थी।

एक दूसरे की झलक पाकर दोनों के चेहरे खिल पड़े थे! रैस्टौरेंट के मुख्य द्वार की ओर बढ़ते हुये दोनों ने एक-दूसरे की कुश्ल-क्षेम पूछी थी। आनंद ने आगे बढ़कर अनिता के लिए रैस्टौरेंट का दरवाज़ा खोला और उसके पीछे अंदर दाखिल हो गया।

बैरे ने आनंद के आग्रह पर दोनों को बिना धूम्रपान वाले स्थान में एक ‘टेबल’ दे दी थी! कितनी खुश और उत्साहित नज़र आ रही थी, अनिता! इसका आभास उसकी हर बात से हो रहा था! कितने ध्यानमग्न होकर वह आनंद की हर बात को सुन रही थी!

बातों ही बातों में आनंद ने अपना विश्वास दोहराया था - "अनिता, तुम अब मेरी हो... दुनिया की कोई भी शक्ति अब हमें जुदा नहीं कर सकती। हाँ, तुम्हें ब्याहता बनाकर ले जाने में भले ही कुछ देर हो जाये लेकिन मैं शादी करूँगा तो तुम्हीं से...!"

"सच, पक्की बात है?" अनिता ने आनंद की आँखों में अपनी आँखें डालकर पूछा था।

"बिलकुल...निस्संदेह, पक्की बात है," अपने पक्के इरादे को दर्शाते हुये, आनंद ने हामी भरी।

कुछ सोचकर अनिता ने दूसरे ही क्षण पूछा, "एक बात बताओ।"

"हाँ, पूछो?"
"...और यदि मैं ही अपना इरादा बदलते हुये आपसे शादी करने से इंकार कर दूँ तो.... आप क्या करेंगे"

"मैं ज़हर खाकर मर जाऊँगा…? कदापि नहीं। ऐसा तो कायरों का काम होता है। मैं तुम्हें ऐसी हालत में अपने संग भगाकर ले जाऊँगा।"

"इतनी हिम्मत है, आप में?"

"तुम अपनी हिम्मत की बात करो, बोलो मेरे साथ चलने को तैयार होगी?" यह कहकर आनंद ने अनिता के विश्वास और इरादे को परखना चाहा था।

"भागकर...? ना, बाबा ना! मैं एक मध्यम और शरीफ़ परिवार से ताल्लुक़ रखती हूँ। ऐसा मैं हरगिज़ नहीं कर सकती," अनिता ने तब एक चुटकी ली और आनंद को परेशान होते देखकर कहा, "मैं तो तुम्हारे संग डोली में बैठकर जाऊँगी और अपने रिश्ते-नातेदारों से विदा लूँगी ... और आप भी शरीफ़ों की तरह बारात लेकर आना..."

...और कुछ क्षण माहौल दोनों के कहकहों से गूँज उठा था। इसके पश्चात ख़ामोशी के कुछ पल, दोनों के चेहरों पर मुस्कान और आँखों में सुनहरी सपनों की एक झलक देखी जा सकती थी। देखते ही देखते आनन्द ने अनिता को अपने आगोश में भर लिया और हल्के से उसके मुँह को चूम लिया था। अनिता ने फिर अपनी उँगली से आनन्द के लबों को दूर करते हुये दोबारा पूछा, "अच्छा, अब यह बताओ, बारात कब ला रहे हो...?"

"तुम्हें अभी उस दिन का कुछ इंतज़ार करना होगा, अनिता। मैं निश्चित रूप से अभी कुछ नहीं कह सकता " आनंद ने स्पष्ट किया।

"लेकिन, आप कम-से-कम इतना तो बता ही सकतें हैं कि आखिर कब तक ...?"

"तुम्हारी शादी की तारीख तक।"

"और, मेरी शादी कब होगी?"

"जब मेरी होगी...!"

"मज़ाक मत करो, आनंद!" थोड़ा भावुक होते हुये अनिता ने फिर कहना शुरू किया, "मुझे डर है आनंद कि तब तक बात कुछ बिगड़ ही न जाये ...अपनी बात पूरी करने से पहले वह रुक गयी।
"एक बात मैं पुछूँ, अब?"

"पूछो," अनिता ने अपनी गर्दन हिलाकर अपनी सहमति दी और उत्सुकता से उसके सवाल को सुनने का इंतज़ार करने लगी।

"अनिता, क्या तुम्हें मुझ पर भरोसा है? यदि तुम्हें कुछ महीने और मेरी इंतज़ार करना पड़ा तो क्या तुम मेरा इंतज़ार कर सकोगी... हो सकता है, एक साल लग जाये, दो साल भी लग सकतें हैं ...बारी जल्दी भी आ सकती है। विदेश जाने का मामला है, 'यू नो’ तुम भली-भाँति यह बात समझती हो...!"

"मम्मी तो कह रही थीं कि जैसे आपको यह रिश्ता ही मंजूर नहीं इसलिए आप लोग शादी की तारीख तय नहीं कर रहे। मम्मी यह भी कह रहीं थीं कि ज़्यादा से ज़्यादा अप्रैल तक ही इंतज़ार कर सकते हैं... मुझे तो डर लगने लगा है, आनंद कि कहीं ऐसा ...?"

"क्या तुमने अपने मम्मी-पापा को विश्वास नहीं दिलाया ?"

"दिलाया था, लेकिन मेरे विश्वास दिलाने से क्या होता है, माँ से तो उस दिन मैं इसी बात को लेकर झगड़ पड़ी थी ...मगर पापा से कौन...?" अनिता ने थोड़ा मायूस होते हुये फिर कहा, "दुनियाँ वाले ही कब चैन लेने देते हैं, आनंद? आप तो अच्छी तरह जानते ही हैं कि मम्मी हृदय-रोग से पीड़ित हैं, ईश्वर न करे यदि ऐसा हुआ तो उनसे यह सदमा बर्दाश्त नहीं होगा...मैं कहीं की न रहूँगी। किसी दूसरे-से शादी करने की बात तो मैं कभी सोच भी नहीं सकती, ज़हर खाकर ..."

इससे पहले के अनिता अपनी बात पूरी कर पाती, आनंद ने अपना हाथ उसके मुँह पर रख दिया और एक बार फिर अनिता को अपनी बाँहों में भर लिया! कहते-कहते अनिता का गला रुँध गया था, उसकी आँखें सजीली हो गयी थी! अश्रुओं की एक धार उसकी गालों से बहती हुई आनंद के कंधों पर टपकने लगी थी!

उसके आँसू पोंछते हुये आनंद बोला - "पगली, मुझ पर तो तुम्हें भरोसा है! चलो, अब हमे जाखू मंदिर भी जाना है, वापसी में यहीं आकर शाम की चाय लेंगे।" बैरे के लिये टेबल पर ‘टिप’ रखने के बाद आनंद ने अनिता का हाथ अपने हाथ मे ले लिया था।

'गुफा' रेस्तरां से निकल कर दोनों जाखू मंदिर का फासला तय करने लगे थे। 'स्केटिंग रिंग' तक पहुँचते-पहुँचते आनंद की साँस बुरी तरह से फूलने लगी थी। अपनी साँस नॉर्मल करने के लिये आनंद वहीं एक तरफ रेलिंग के पास खड़ा हो गया। एक बार फिर आनंद ने अनिता को अपनी बाँहों में भरना चाहा लेकिन अनिता ने अपना इशारा आते-जाते लोगों की तरफ करते हुये अपनी शर्माहट का इज़हार किया। थोड़ी देर में जब आनंद की साँस सामान्य हुई तो दोनों जाखू मंदिर पर जाने वाले रास्ते पर हो लिये थे।

ज्यों-ज्यों मंदिर जाने वाले रास्ते की चढ़ाई चढ़कर दोनों मंदिर के करीब होते जा रहे थे त्यों-त्यों आनंद की साँस और भी फूलती जा रही थी। आगे बढ़ने से पहले उसे अपनी साँस 'नॉर्मल' करने के लिये थोड़ी देर और रुकना पड़ रहा था! इसी बहाने रूककर वह अनिता के कई 'पोज़' अपने कैमरे में कैद करता जा रहा था!

मंदिर पहुँचकर उन्होंने मंदिर में चढ़ाने के लिये प्रसाद लिया तथा बंदरों को खिलाने के लिये चने भी खरीदे। इसी बीच अनिता ने आनंद को बंदरों से सावधान रहने के लिये कहा और उसे कुछ आप-बीते किस्से भी सुनाये। आनंद को अनिता की बात पर अभी पूरा यकीन नहीं हो रहा था कि सहसा उसने एक बंदर को मंदिर में आते हुये एक भक्त की टाँग के पास कूदते देखा! राहगीर की टाँग पकड़ कर बंदर ने अपने दूसरे हाथ से उसकी 'साइड पॉकेट' से प्रसाद का लिफाफा निकाल लिया था। देखते ही देखते इतने में एक और बंदर बिजली की फुर्ती से दूसरे राहगीर के कंधे पर कूदकर, उसके चश्मे को लेकर दायें हाथ की तरफ ऊँची दीवार पर जा बैठा था। इस काम में यह बंदर बहुत माहिर था और आते-जाते दर्शनार्थियों के चश्में मौका पाकर उतार लेता था और तभी उन्हें नीचे गिरा कर वापिस करता था जब उसे हरजाने के बतौर 'बिस्कुट' का पैकट अथवा कुछ और खाने की वस्तु मिल जाती! अगले ही क्षण बंदरों की एक अन्य टोली को अपनी तरफ़ बढ़ता देखकर, एकबार तो दोनों भयभीत हो गये थे। असहाय-सी, अनिता डर के मारे चिल्ला पड़ी थी और उसने अपने आप को आनन्द की बाँहों के सपुर्द कर दिया।

मंदिर में प्रभु-दर्शन से पहले दोनों ने अपने हाथ धोये और फिर दर्शन करने के बाद पंडित जी से आशीर्वाद लिया! दोनों ने अपनी-अपनी मन्नतें मानी।

"थैंक्यू," कहते हुये अनिता ने आनंद की तरफ देखते हुये अपने चेहरे पर एक हल्की-सी मुस्कान बिखेरी। जवाब में आनंद विस्मित हो उठा।

मंदिर की सीढ़ियाँ उतर कर दोनों अब मंदिर के अहाते में वहाँ आ गये जहाँ एक बंदर लोगों के हाथ से चने लेकर खा रहा था। मंदिर के एक भक्त के आश्वासन पर और थोड़ा साहस बटोर कर दोनों उस बंदर को भी चने खिलाने लगे थे। ऐसा करके उन दोनों को बड़ा मज़ा आ रहा था!

"आनंद, अब खाना खायें, क्या? चलो, उधर उस बेंच पर बैठते हैं, धूप में?... तुम्हारे लिये आलू की भाजी, पूड़ीयों के साथ काजू और किशमश वाला हलवा बनाकर लायी हूँ...," बड़ी उत्सुकता और जोशीले स्वर में अनिता कहती ही चली गई।

फिर आनंद की तरफ देखते हुये पूछने लगी थी- "तुम्हें यह सब कुछ खाना पसंद है ना? मुझे आपकी पसंद का अभी पता नहीं और न ही मुझे आपसे यह सब-कुछ पूछने का मौका ही मिला है।"

"हमारा क्या, हम तो संत आदमी हैं, प्यार से हमें चाहे कोई ज़हर खिला दे।"

"कितनी भाग्यशील होऊँगी मैं, ऐसे सीधे-साधे इंसान को पाकर..!" अनिता ने भी जवाबी व्यंग्य कसा था।

आनंद बस मुस्करा कर रह गया था!

बातें करते-करते अनिता अपने बैग से खाने के डिब्बे निकालकर खाना परोसने लगी। दोनों ने इकट्ठे बैठ कर खाना खाया और काफी देर तक आत्मीयता की बातें की।

कुछ देर मंदिर के अहाते में और रुककर दोनों वापिस लौटने लगे थे। राह में उन्होंने कई और जोड़े भी देखे और उन पर एक-आध अपने 'कॉमेंट्स' भी दिये।

"आनंद...," दबी आवाज में अनिता ने आनंद का ध्यान अपनी और खींचा।

"हाँ, कहो...?"

"आपने एक बात 'नोट' की...?

"क्या...?"

"यही कि आते-जाते कुछ लोग हमें एक हसरत भरी नज़र से देखकर कुछ बुदबुदाते हैं। बाज़ार और आबादी वाले हिस्से में भी मैंने यही अनुभव किया," अनिता ने विस्तार में कहा।

"अनिता, तुमने मेरे मुँह की बात छीन ली। मैं भी तुमसे यही बात कहने वाला था, "आनंद ने अनिता की हाँ में हाँ मिलाते हुये कहा।

"भला, लोग क्या सोचते होंगे?"

"यही कि हमारा आपसी रिश्ता क्या है?"

"बिलकुल दुरुस्त, मेरा भी ऐसा ही सोचना है...," अनिता ने भी अपनी सहमति प्रकट की। फिर उसने अपनी बाकी की बात पूरी की, "लोग हमें बाँहों में बाँहें डालकर जाते हुये देखकर अचरज़ में रहे होंगे। फिर, हमारे बीच पति-पत्नी के संबंध होने की कोई निशानी उन्हें जब न मिलती होगी तो सोचते होंगे, प्रेमी हैं!"

"तो, इसमें कौन सा गल्त सोचते हैं?"

आनंद का जवाब सुनकर अनिता की साँस जैसे डर के मारे गले में ही अटक गयी।

"अनिता, अगली बार जब यहाँ आएँगे तो लोगों को हम ऐसा सोचने का मौका नहीं देंगे। स्वयं ही हमारे रिश्ते के बारे में उन्हे अंदाज़ा लग जाएगा, "आनंद ने अनिता को भरोसा दिलाते हुये कहा।

"वह कैसे?" अनिता ने जिज्ञासा प्रकट की।

"तुम्हारे हाथ में लाल चूड़ा और तुम्हारी मांग में भरे सिंदूर को देखकर...!"

यह सुनकर अनिता थोड़ा शर्मायी और मन ही मन पुलकित होने लगी थी।

आनंद की याद में खोये हुए अतीत की इस एक मुलाक़ात को याद करके उसके होंठों पर एक मुस्कान फैल गयी। सहसा, मम्मी की आवाज़ उसके कानों में पड़ी। हाथ में कंघा लिये वह अपने बाल पुन: सँवारने लगी। एक लंबा साँस लेते हुये उसने वहीं से पूछा, "क्या बात है, मम्मी?"

"अभी तक तुम्हारे बाल नहीं सँवरे, क्या?" अनिता की माँ सावित्री ने रसोईघर से ही अपनी ऊँची आवाज़ में सवाल किया।

"ओ, हो, मम्मी, क्या बात है? थोड़ी देर और लगेगी, अभी आती हूँ!" अनिता पुन: खीझकर बोली, "मम्मी आज तो रविवार है, दफ्तर की छुट्टी है, लेकिन आपको क्यों जल्दी मची पड़ी है?"

"अरे, भाई, दफ्तर तुझे नहीं जाना है, मेरे को तो कभी भी छुट्टी नहीं होती, इस चूल्हे चौके से! नाश्ता करके मुझे तो फारिग कर ही सकती हो ना...फिर चाहे बाल बनाती रहना या फिर 'डांस' करती रहना। जल्दी से इधर आकर पहले नाश्ता करलो फिर मैंने कपड़े भी धोने हैं ... मैं कपड़ों पर साबुन लगाती जाऊँगी और तुम कपड़ों को पानी से निचोड़ कर बरामदे में तार पर सूखने डालती जाना! अब मैं बूढ़ी हो गयी हूँ, बेटा! अब मुझमें इतनी हिम्मत नहीं रही इतना सब कुछ अकेले करने की..."

"आपको कपड़े धोने के लिये किसने कहा है, मम्मी? रख दो एक तरफ। थोड़ी देर में मैं खुद धो लूँगी," अनिता ने जवाब में कहा।

"तूँ, नाश्ता तो करले पहले, फिर सोचेंगे कि कपड़ों का क्या करना है...," उसकी माँ सावित्री ने फिर अपना तर्क दिया, "तेरी बातों में आ जाऊँ तो हो गये सब काम, मेरे। पिछले हफ्ते से बालों में तेल लगाने के लिये तुझ से कह रही हूँ, लगाया तूने?"

यह सुनकर अनिता खीजते हुये बोली, "मुझे अभी नहीं करना नाश्ता। आप मेरे लिये एक परांठा बनाकर रख दो। जब दिल करेगा खा लूँगी!"

"आ, जा, मेरे बेटा, मैं गरम-गरम पराँठी बना रही हूँ, अभी खा ले, फिर ठंडी का मज़ा नहीं आता।"

"मैंने कहा ना, मम्मी मुझे भूख नहीं है, यूँ ही हाथ धोकर पीछे मत पड़ जाया करो।"

"तुम्हें क्या हो गया है, री। शादी से पहले तो तूँ ऐसी नहीं थी। तुझमें कितना अंतर आ गया है। शादी के बाद तूँ अभी अपने मियां के पास नहीं गयी। शादी से पहले भी तूँ मेरे पास ही थी। वही घर है, वही मैं भी हूँ लेकिन तूँ पहले जैसी नहीं रही। तुझे क्या हो गया है...? यह बदलाव कैसा री?"

"मम्मी मुझे तंग ना करो, प्लीज़। मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो," कहते कहते अनिता सुबुक पड़ी।

अनिता को बेचैन और परेशान होते देखकर सावित्री ने उसे अपनी छाती से लगाते हुये पूछा, "बेटी, क्या बात है, आज तूँ इतना परेशान क्यूँ है? हमने तो जो भी किया सब कुछ तेरी भलाई के लिये ही किया, अब इसमें किसी का क्या दोष है, बेटा? क्या तंग आ गयी है अपनी बूढ़ी माँ से? तूँ कोई पराये घर में थोड़ा ही बैठी है, तेरा अपना घर है...."

अनिता चुप रही। बस सिसकने लगी और सारी बात उसकी सिसकियों ने ज़ाहिर कर दी।

सावित्री फिर उसे सांत्वना देते हुये बोली, "बेटी, मैं तुम्हारी परेशानी से अच्छी तरह वाकिफ़ हूँ। तूँ ही समझदार है, बता जब तक तेरा तबादला न हो, मैं क्या कर सकती हूँ... तूँ धीरज रख बेटा, तेरा तबादला जल्दी हो जायेगा और तूँ रमेश के पास होगी। और रही बात तेरे मियां और सास के सलूक की, वह भी वक़्त के साथ तेरे प्रति ठीक हो जायेगा," एक लंबा साँस लेते हुये पुन: बोली, "बेटी तूँ उस घर में अभी नई-नई गयी है, थोड़ा वक़्त तो हरेक को लगता है, एक दूसरे को समझने में...!"

"माँ, मैंने यह कब कहा है कि मैं तुमसे तंग आ गयी हूँ...? इस घर से उकता गयी हूँ या फिर रमेश के पास जाना चाहती हूँ। आपको और पापा दोनों को ही, जल्दी हो रही थी मुझसे अपना पिंड छुड़ाने की… मुझे कुएँ में धकेलने की...नहीं तो मैं तो आनंद का इंतज़ार कर ही।..," कहते-कहते बस, सुबक पड़ी थी अनिता!

तभी सावित्री अनिता को ढांढस देने की गरज से बोली, "रमेश का खत तो आया था कि वह शीघ्र ही छुट्टी लेकर तुझसे मिलने आयेगा, लेकिन हो सकता है उसे कोई काम आ पड़ा हो या छुट्टी ना मिली हो जिसकी वज़ह से वह आ न सका हो। इंसान की कई मजबूरियाँ होती हैं। फिर चंडीगढ़ कौन सा दूर है, तुम स्वयं, अगले हफ्ते कुछ दिनों की छुट्टी लेकर, उसे मिल आओ। मैं उसे कल फोन कर दूँगी। बस अड्डे आकर खुद तुझे ले जायेगा...।"

यह सब सुनकर अनिता गुस्से से फूट पड़ी, "अब बस करो माँ, कोई ज़रूरत नहीं किसी को फोन करने की। कहीं नहीं जाना मुझे!"

"फिर तुम इतनी परेशान क्यूँ हो, बेटी?"

"माँ, मैंने कहा न, मुझे परेशान मत करो… मुझे मेरे हाल पर ही छोड़ दो!" जवाब में अनिता बोली।

"फिर, बोल बेटी बोल, क्या बात है, अपनी माँ को तो अपने दिल की बात बता ही सकती है न?"
"यह परेशानी सब आप लोगों ने ख़ुद मोल ली है, मैं तो आप लोगों पर भार थी न, जैसे? आपकी सब मुश्किलें और दायित्व पूरा हुआ, मेरी शादी करके...! अब चाहे मैं मरूँ या जीऊँ, आप लोगों की बला से! हाँ, जैसे-तैसे मेरी ज़िंदगी कट ही जायेगी! मेरे लिये अब किसी को कोई परेशान होने की ज़रूरत नहीं है। बेहतर यही होता यदि आप मेरी शादी ओर जगह करने की बजाये मुझे कुएँ में धकेल देते ...मुझे इस दमघोंटू बेचैनी और तन्हा ज़िंदगी से तो रुखसत मिल जाती।"

अनिता अपने मन की सारी भड़ास निकाल देना चाहती थी। उधर सावित्री भी अपने पर काफी नियंत्रण रखने की कोशिश में नाकाम रही और रुँधे गले से बोली, "बेटी, अब इसमें हमारा क्या दोष है, हमने तो अपनी तरफ से सब कुछ देख-भाल कर तुम्हारे लिये यह सब कुछ किया था।"

"माँ, मैं भी किसे दोष दूँ, इसमें सारा दोष बस मेरा ही है कि तुम्हारी बातों में आकर मैं बेसब्री हो बैठी और बिना सोचे समझे इस नर्क में कूद बैठी।"
"धीरज रख बेटी, सब ठीक हो जायेगा," कहते हुए सावित्री उठकर 'बेडरूम' में चली गयी।

अनिता भी पास ही में पड़ी चारपाई पर औंधी लेट गयी। जब वह सोकर उठी तो उसने चारपाई पर पड़े दर्पण में खुद को निहारा। उसकी आँखें लाल सुर्ख, थकी-थकी, और सूजन की वज़ह से बड़ी-बड़ी लग रही थीं। अपनी माँग में भरा सिंदूर भी उसे हल्का लगा। कुछ पल यूँही वह दर्पण को पथराई दृष्टि से तकती रही।

शादी के कई महीने बाद अनिता की गोद आज भी सूनी थी। आज भी वह अपनी माँ के पास, अपने पति से दूर तन्हा ज़िंदगी बिता रही थी।

"कितना अंतर है दोनों में ...?" शायद वह सोच रही थीं। "आनंद मुझे कितना चाहता था, कितना मुझसे प्यार करता था, चंडीगढ़ से मुझे रोज़ फोन करने के इलावा हर सप्ताह मुझसे मिलने आता था। हम दोनों में आत्मीयता की कितनी बातें थी...हम दोनों, एक दूसरे के कितना करीब आ चुके थे... कितना एक दूसरे को समझते थे ...रमेश है कि सांसारिक दृष्टि से मेरा पति होने के बाद भी जैसे मेरा कुछ नहीं लगता। उसको मुझमे कोई दिलचस्पी नहीं। काश, मैं आनंद के लिये कुछ समय और इंतज़ार करती। पिया-मिलन की इंतज़ार तो अब भी कर रही हूँ, थोड़ी इंतज़ार मुझे आनंद के लिये भी करनी चाहिए थी। फिर दोनों हालातों में फर्क ही क्या है, कितना अंतर है?" यही प्रश्न रह-रहकर अनिता को झँझोड़ रहा था।

... और न जाने कब तक निरुत्तर-सी, अनिता, दुनिया से बेख़बर चारपाई पर औंधी पड़ी रही।


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