अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
07.02.2007
 
वक्त के प्रवाह में
अशोक गुप्ता

वक्त के प्रवाह में जो भी था सो बह गया।
हम कगार पर खड़े,
यहाँ लड़े वहाँ लड़े,
आँख जब खुली पता चला कि कुछ न रह गया,
वक्त के प्रवाह में जो भी था सो बह गया।

हर बुज़ुर्ग जो मिला हमसे यही कह गया,
देश को सम्हालना,
यूँ ही खो न डालना,
रेत सा ईमान था, ढह गया सो ढह गया,
वक्त के प्रवाह में जो भी था सो बह गया।

हर गरीब था कि ज़ुल्म हाथ जोड़ सह गया,
हम किनारा कर गए,
दूर से निकल गए,
हमको क्या पड़ी थी लहू बह गया तो बह गया,
वक्त के प्रवाह में जो भी था सो बह गया।


त्राहि त्राहि मच उठी, यह गया लो वह गया,
हम पोटली पकड़ रहे,
स्वर्ण को जकड़ रहे,
डाकुओं का गिरोह लूटकर सुबह गया,
वक्त के प्रवाह में जो भी था सो बह गया।


शहर शहर सिहर उठा कि गाँव गाँव दह गया
गली गली सुलग उठी,
वसुंधरा बिलख उठी,
धर्मपाल का अधर्म दे हमें प्रलय गया,
वक्त के प्रवाह में जो भी था सो बह गया।

हरेक जीव जान में छा अजीब भय गया,
मृत्यु की पुकार सुन,
माँ का चीत्कार सुन,
आसमां भी कैसी कैसी यातनाएँ सह गया,
वक्त के प्रवाह में जो भी था सो बह गया।

इन्सां बहक बहक उठा कैसी पी वो मय गया,
प्ढ़े लिखे अनपढ़ हुए,
जो संत थे कुजन हुए,
बापू तुम्हार स्वप्न का बचा क्या रह गया,
वक्त के प्रवाह में जो भी था सो बह गया।
अब तो आँख खोल लो, नींद का समय गया,
अपने मन में ठान लो,
अपना सीना तान लो,
फिर न पूछना कहाँ सूर्य का उदय गया,
वक्त के प्रवाह में जो भी था सो बह गया।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें