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12.20.2007
 
रेल्वे स्टेशन पर
अशोक गुप्ता

मैं कम्पार्टमेन्ट के अन्दर हूँ
एक कोहनी खिड़की पर टिकाए
तुम बाहर प्लॅटफॉर्म पर खड़ी हो
मेरी पसन्द की नीली साड़ी पहने

लगता है मैं फिर बारह साल का हूँ
र्बोडिंग स्कूल की ट्रेन में
डरा हुआ गले में दुखती गाँठ लिए
एक भयानक दुःस्वप्न की जकड़ में

तुम ट्रेन चलने का इंतज़ार कर रही हो
अपनी घड़ी दो बार देख चुकी हो
मैं नज़र बचाकर आँसू पोंछता हूँ
वह तुम्हारा इंतज़ार कर रहा होगा

स्टेशन के बाहर
कि तुम कार में बैठो
और चैन की साँस ले कर कहो
“वह चला गया आखिरकार”


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