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06.09.2007
 
रामला
अशोक गुप्ता

वह एक फटी कमीज़ पहने
झाड़ू, बर्तन, कपड़े करने
हर रोज़ आता।

मैने उसे एक कमीज़ दी
जो मैं पहनता नहीं था,
फिर एक,
फिर एक और,
पर वह फिर वही फटी कमीज़ पहने
झाड़ू, बर्तन, कपड़े करने
हर रोज़ आता।

“क्यों ?” मैं पूछता।
हर बार उसका जवाब होता
“घर भेज दी
भाई के पास डूंगरपुर”
और वह फिर वही फटी कमीज़ पहने
झाड़ू, बर्तन, कपड़े करने
हर रोज़ आता।


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