अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
07.02.2007
 
पत्थर
अशोक गुप्ता

वो पत्थर जो हमने
राह चलते बाग़ से, धरती से, उठाए,
जिन्हें हमने चुना,
आपस में मिलाया, बदला,
चमकाया, और सम्हाला
वे अलग अलग रंग, शक्ल,
छुअन और सपनों के थे।

जिन रत्नों के खज़ानों को
हमारी बोझिल जेबों ने ढोया,
माँ की डाँट की अपेक्षा,

वे सब समा गए
टाउनसेन्टर के काँक्रीट में।
और जहाँ हम चपटेवालों को
सात, आठ, ग्यारह, टिप्पे खिलाते
तालाब में फेंकते थे,
वहाँ है एक विशालकाय
कांच और एल्युमिनियम का
सिटीप्लाज़ा,
शहर का सबसे ऊँचा प्रतीक।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें