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06.09.2007
 
माँ
अशोक गुप्ता

सड़क की रोशनी
माँ और मेरे दूर गाँव की
यादों का धुंधलाते खालीपन
भर रही है।

तेज बुखार में तपती
मैं बेहोशी में बड़बड़ा रही हूँ।
माँ पिछवाड़े से मिर्ची और कुछ केले
तोड़ लाती है।

बाज़ार से लौटती है
कुछ रुपए लेकर,
जो वैद्य के लायक भी नहीं।

बत्तियाँ बुझने पर
झींगुर का स्वर
और हमारी सिस्कियों का सन्नाटा।


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