सड़क की रोशनी माँ और मेरे दूर गाँव की यादों का धुंधलाते खालीपन भर रही है।
तेज बुखार में तपती मैं बेहोशी में बड़बड़ा रही हूँ। माँ पिछवाड़े से मिर्ची और कुछ केले तोड़ लाती है।
बाज़ार से लौटती है कुछ रुपए लेकर, जो वैद्य के लायक भी नहीं।
बत्तियाँ बुझने पर झींगुर का स्वर और हमारी सिस्कियों का सन्नाटा।