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07.02.2007
 
कैसे मैं समझाऊँ
अशोक गुप्ता

क्या नज़दीकी या दूरी का
प्रिये है अपना यह नाता
कैसे मैं समझाऊँ तुमको
मैं खुद समझ नहीं पाता

तुम सरहद के पार बसी हो
मैं हिन्दुस्तानी कहलाता
देश विदेश के बीच की सीमा
मैं खुद समझ नहीं पाता

तुमको हो गर ईद मुबारक
दीवाली दिन मुझको भाता
धर्म धर्म में भेद है कैसा
मैं खुद समझ नहीं पाता

बदली किसकी नदिया किसकी
क्या पर्वत बाँटा जाता
इंसानों का खून बहे क्यों
मैं खुद समझ नही पाता

क्या नज़दीकी या दूरी का
प्रिये है अपना यह नाता
कैसे मैं समझाऊँ तुमको
मैं खुद समझ नहीं पाता


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