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06.09.2007
 
झूठ
अशोक गुप्ता

मार्गाओ, गोवा
फादर एग्निल का आश्रम,
कुछ कॉटेज।

एक ‘माँ’ हर घर में
और अनाथ बच्चे।
हर घर साफ,
व्यविस्थत।

अक्सर शाम को
हम वहाँ जाते हैं,
अरुना, मैं,
और छः वर्षीय आभा।

मुंडेर पर बैठे, हम
बच्चों को खेलता देखते हैं।
शाम गहराते स्लेटी रंगों में
बुझ रही है,
बच्चे इधर उधर दौड़ते हुए,
थिरकते, धक्के देते और लड़ते।

पता नहीं कब से फ्रेज़र
चुपके से मेरे पास खड़ा है।
अपने नन्हे हाथों से मेरी उँगली पकड़कर
पूछता है,
“क्या तुम मेरे पापा बनोगे?”

आकाश में आखिरी रोशनी
उस रात की खामोशी में
धुंधला कर समा गई।
मैने झूठ बोला “हाँ”,
बीस साल पहले।


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