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07.02.2007
 
चीं भैया चीं
अशोक गुप्ता


आज फिर जून की चिलचिलाती धूप
में, चलते चलते थक गया हूँ
आज फिर कुछ नहीं बेचा, कुछ नहीं मिला

जी चाहता है बगीचे की बेंच पर
कुछ देर सो जाऊँ
पर नहीं, अभी बहुत दूर चलना है

बचपन की याद आती है;
बड़ा भाई मेरा हाथ मरोड़े
मेरी गर्दन अपनी भिच्ची में लेकर
दबाता है
“बोल चीं, बोल चीं”
मैं दुबला पतला भैया से सात साल छोटा-
“नहीं बोलूँगा, नहीं, कभी नहीं”
साँस घुँटने को होती, तो भी नहीं
नहीं, कभी नहीं!

पोटली अपने कन्धे पर एक बार फिर
खिसका कर जमाता हूँ
और कहना चाहता हूँ – कभी नहीं
पर मुँह से निकलता है
“चीं भैया चीं”


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