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ISSN 2292-9754

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01.27.2017


चमचा अलंकरण समारोह

 (देश-दुनिया के हर तबके के चमचों से दोनों हाथ जोड़ क्षमा-याचना के बाद)

वैसे तो ऑफ़िस में रोज़ जनता के चढ़ावे से कोई न कोई समारोह चलता ही रहता है। पर अबके साहब ने अपनी रिटयारमेंट से कुछ दिन पहले दूसरे साहबों से सबसे अलग सोचा कि क्यों न जाते-जाते चमचा अलंकरण समारोह आयोजित कर सबको हक्का-बक्का किया जाए। और उन्होंने अविलंब घोषणा कर दी कि अगले से अगले शनिवार को वे ऑफ़िस में चमचा सम्मान समारोह आयोजित करने जा रहे हैं और उसका सारा ख़र्चा वे स्वयं वहन कर अपने कार्यकाल में चमचागीरी के मैदान में निसदिन डटे चमचों को सम्मानित करेंगे। पुरस्कारों की संख्या पाँच होगी- चमचागीरी का लाइफ़ टाइम अचीवमेंट अवार्ड, बेस्ट चमचा ऑफ़ द ईयर ख़िताब, अतिविशिष्ट चमचा मेडल, विशिष्ट चमचा पुरस्कार एवं चमचा सांत्वना पुरस्कार।

ज्यों ही यह सकुर्लर ऑफ़िस में सर्कुलेट हुआ तो वे जो उनके चमचे थे, वे तो हरकत में आए ही पर वे जिनका उनके साथ छत्तीस का आँकड़ा था, वे भी कुछ-कुछ हरकत में आए बिना न रह सके। वे जो चमचे नहीं थे, वे मन मसोस कर, दिल पर हाथ रख बार-बार बस यही कहते रहे, “काश! साहब की चमचागीरी कर ली होती तो....” पर अब क्या पछताए होत जो चिड़िया चुग गई खेत!

जिधर देखो, उठते-बैठते सारा दिन बस एक ही चर्चा। साहब समारोह में पता नहीं किसको चमचागीरी के लाइफ़ टाइम अचीवमेंट के अवार्ड से नवाज़ेंगे? साहब पता नहीं किसको बेस्ट चमचा ऑफ़ द ईयर का ख़िताब देंगे? साहब पता नहीं किसको अतिविशिष्ट चमचे के मेडल से विभूषित करेंगे? साहब पता नहीं किसको विशिष्ट चमचा पुरस्कार से अलंकृत करेंगे? ख़ैर, सांत्वना पुरस्कार तो हुआ न हुआ बराबर होता है। साहब की चमचागीरी के पुरस्कार पाने वालों की लिस्ट को लेकर कभी इसका नाम आगे होता तो कभी उसका। ख़ैर, काम तो ऑफ़िस में पहले भी नहीं होता था। ऑफ़िस में केवल एक शर्मा ही हैं जो सदा ओवर बर्डंड रहे हैं बेचारे। वे न होते तो ऑफ़िस का चक्का जाम हो गया होता कभी का। वे इस दफ़्तर की ग्रीस हैं, वे इस दफ़्तर के लादा हैं, वे इस दफ़्तर के भीत हैं। वे हैड ऑफ़िस में मिल-मिलाकर हर लैटर अपने को ही जारी करवाते हैं। या कि चुपके से यहाँ-वहाँ दूसरों के प्रोग्राम में भी जा आते हैं। इसलिए एक वही हर जगह विद्यमान रहते हैं। बेचारे इस दफ़्तर के लिए पता नहीं क्या-क्या सहते हैं। भगवान उनको इस ऑफ़िस में हमेशा बनाए रखे।

पर इस घोषणा के बाद जब देखो, जहाँ देखो, जिसे देखो, ऑफ़िस का सारा काम बंद कर लाइफ़टाइम चमचागीरी अवार्ड के तथा चमचागीरी के दूसरे अवार्डों को लेकर एग्ज़िट ओपीनियन एकत्रित करने में जुटा हुआ। सबके अपने-अपने अनुमान। सबके अपने-अपने तीर तो अपनी-अपनी कमान।

ऐसा नहीं कि उन्होंने अपने चमचों को किसी भी जगह छूट न दी हो। उन्होंने अपने टेन्योर में किसीको ऑफ़िस में छूट दी हो या न, पर ऑफ़िस में चमचों को उनकी चमचागीरी के हिसाब से पूरी छूट दे रखी थी। ये जानते थे कि जो चमचों को छूट और विशेष छूट उनकी चमचागीरी के स्तर के अनुरूप न दी जाए तो वे हंगामा बरपा सकते हैं। साहब को पलक झपकते ही “सूखने पा” सकते हैं।

वैसे ये साहब पहले वालों से कुछ अधिक व्यावहारिक साहब साबित हुए। ये भले ही धूप में हुए सफ़ेद बालों को कलर करते रहे हों पर ये थे चमचों की मानसिकता से भलीभाँति परिचित। इसलिए ये कुछ मैनेज कर पाते या नहीं, पर चमचों को भलीभाँति मैनेज करते रहे। उनके नज़दीकी कहते हैं कि चमचों को मैनेज करने की उनके पास पीएच.डी. हैं। इसके बाद भी चमचों को पालने पर शोध का लंबा अनुभव इनके पास है। एक यह भी वजह रही कि इनके कार्यकाल में हमारे ऑफ़िस के चमचों को कभी इनसे कोई शिकायत न रही। इन्होंने हर चमचे को असल में पूरी ईमानदारी से उसकी चमचागीरी के हिसाब से देखा-परखा। इनके हाथों से ऑफ़िस के सभी चमचे अपनी-अपनी चमचागीरी के स्तर के अनुरूप इनसे अपना-अपना पुरस्कार पा प्रसन्न रहे। इनसे शिकायत थी तो बस उन्हें, जिनको चमचागीरी से अलर्जी थी। उनकी इस अलर्जी को लेकर साहब ने कई बार उनको स्टाफ़ मीटिंग में इनडायरेक्टली सलाह भी दी कि वे अपनी इस जान लेवा अलर्जी का इलाज किसी अच्छे डॉक्टर से समय रहते करवा लें ताकि ऑफ़िस में वे स्वस्थ रहें, मस्त रहें। इसके लिए उन्हें ऑफ़िस से जितने दिन ग़ायब रहना हो, रहें। वे उन्हें कुछ नहीं कहेंगे। वे उनसे पूछेंगे भी नहीं कि वे इतने दिन कहाँ रहे। पर वे जब ऑफ़िस आएँ तो इस अलर्जी से मुक्त होकर ही आएँ।

साहब की चमचागीरी से अलर्जी दूसरी सब अलर्जियों में सबसे अधिक जानलेवा अलर्जी होती है। इस अलर्जी के चलते ऑफ़िस में बंदा न घर का रहता है न घाट का। पर उन चमचागीरी से अलर्जी वालों को न जाने क्यों इस अलर्जी से इतना प्यार था कि.... वे ऑफ़िस छोड़ सकते थे पर अलर्जी नहीं। इलाज के लिए तरह-तरह के इंसेंटिवों का लालच देने के बाद भी वे अपनी अलर्जी का इलाज पता नहीं क्यों करवाना नहीं चाहते थे?

….आखिर वह रोज़ आ ही गया जब ऑफ़िस के बाहर एक पंडाल लगाया गया। उसे एक प्रोजेक्ट के जाली बिल बनवा यों सजाया गया कि... उसकी साज-सज्जा देख कोई अप्सरा भी उस वक़्त उसे देखा लेती तो ईर्ष्या से जलकर राख तो नहीं पर कोयला अवश्य हो जाती।

पंडाल में आईसीटी देख रहे वर्मा ने दस बजे ही साहब भक्ति के गीत बजाने शुरू कर दिए थे। कम्बख़्त ने क्या ग़ज़ब का साहब भक्ति के गीतों का चयन किया हुआ था! हर गीत ऐसा कि सुनकर कलेजा मन को आ जाए, मरता हुआ बंदा भी भगवान के चरण ढूँढने के बदले साहब के चरण ढूँढने को हाथ-पाँव मारने लग जाए।

देखते ही देखते पंडाल सज-धज कर आए ऑफ़िस के कर्मचारियों से भरने लगा। पहली बार आज ऑफ़िस के सारे कर्मचारी एक साथ उपस्थित हुए थे। हर चमचा दूसरे से अधिक सजा हुआ, चमचागीरी के भार से इतना लदा हुआ कि बेचारे से चला भी न जाए। हर चमचा एक दूसरे को घूरता हुआ। एक दूसरे पर सड़ता हुआ। यह तो लगभग सबको पता था कि लाइफ़ टाइम चमचागीरी अवार्ड तो बस उन्हें ही मिलेगा पर फिर भी... दूसरे अवार्डों को लेकर अभी भी स्थिति स्पष्ट नहीं थी।

तय समय पर साहब सरकारी गाड़ी से मुस्कुराते हुए सपत्नीक, पत्नी के ब्रितानी कुत्ते सहित उतरे तो उनका स्वागत करते उनके चमचे उनके गले में माला डालने के लिए, उन्हें अपना बुका देने के लिए एक दूसरे को पीछे धकेलने लगे। चमचों में यही होड़ कि किसका बुका साहब के हाथों में पहले सजे, किसकी माला सबसे पहले साहब की गरदन में फँसे। जिनको चमचागीरी से अलर्जी थी वे भी आज हाथ में बुका लिए साहब के स्वागत के लिए लाइन में खड़े दिखे तो मंद-मंद मुस्कुराते साहब को विश्वास हो गया कि अब कलियुग ख़त्म और चमचायुग शुरू। चमचायुग को आने से अब कोई माई का लाल नहीं रोक सकता।

साहब ने अपने ख़ासों से सबसे पहले बुके ग्रहण कर अपनी पत्नी व पत्नी के डियर कुत्ते सहित कुर्सी ग्रहण की तो स्टाफ़ सेक्रेटरी ने मंच सँभाला, “हे मेरे ऑफ़िस के साहब भक्तो! आज वह घड़ी आ ही गई जिस घड़ी का हमें बेक़रारी से पिछले पंद्रह दिनों से इंतज़ार था। हम आभारी हैं अपने साहब के कि जिन्होंने इस ऑफ़िस में एक नई परंपरा की शुरूआत की। उन जैसा युग पुरुष कोई नहीं। वे साक्षात् युग पुरुष हैं....,” इससे पहले की मंच के नीचे बैठे तालियाँ बजाते साहब ने ख़ुद ही तालियाँ बजानी शुरू कीं तो पंडाल में बैठा हर चमचा दूसरे चमचे से ज़्यादा ज़ोर से अपनी हथेलियाँ पीटने लगा।

साहब ने अपना कोट ठीक किया और रंग-बिरंगी प्लास्टिक के फूलों की मालाओं से लदी गरदन लिए माइक के पास तनकर खड़े हुए। कुछ देर तक अपना ख़राब गला साफ़ करने के बाद बोले, “मित्रो! आज आप सबको यहाँ एक साथ पहली बार देख मन को बड़ी तसल्ली हो रही है। साहब होकर ऑफ़िस में काम तो सब करते हैं पर कुछ ख़ास कर रिटायर हुआ जाए तो रिटायर होने का मज़ा ही कुछ और है। सो मैंने सोचा कि कुछ ख़ास करके ही रिटायर हुआ जाए। और उसी पॉज़िटिव सोच का परिणाम है कि आज हम सब यहाँ....

निर्विवादित है कि चमचे हर युग में रहे हैं। चमचे हर काल में रहे हैं। चमचे हर दरबार में रहे हैं। चमचे हर सरकार में रहे हैं। चमचे हर दफ़्तर में रहे हैं। चमचे हर अफ़सर के रहे हैं। भले ही वेदों, उपनिषदों, संहिताओं, आरण्यकों, में चमचों के बारे में सैद्धांतिक रूप से कुछ लिखा गया हो या न, पर इनमें भी शोधार्थियों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष चमचागीरी के पुख़्ता सबूत मिले हैं। असल में जिनके कोई सिद्धांत नहीं होते, उनका सैद्धांतिक पक्ष भी नहीं हो सकता। ऐसे में चमचागीरी का कोई पुख़्ता सैद्धांतिक-दार्शनिक पक्ष हो या न, पर इसका व्यावहारिक पक्ष अनादिकाल से बड़ा मज़बूत रहा है।

दोस्तो! चमचे अपने को हर बार शुभचिंतक कहलवाने की भरपूर कोशिश करते हैं। पर चमचे चमचे ही होते हैं, शुभचिंतक नहीं। चमचा जब भी अवसर मिले अपनी चमचाई को प्रदर्शित करने का कोई अवसर नहीं छोड़ता। वह मुँह सामने कुछ और होता है और पीठ पीछे कुछ और। उसके पास चमचाई प्रदर्शित करने को शब्दों का भरा पूरा शब्दकोश होता है। जबकि शुभचिंतक को अपनी शुभचिंतकी के प्रदर्शन से कोई लेना-देना नहीं होता। उसकी ज़ुबान शब्दकोशों के शब्दों से बहुत ऊपर होती है। शुद्ध हवा की तरह, शुद्ध जल की तरह। चमचा तन से समर्पित होता है तो शुभचिंतक मन से। चमचा दीन-ईमान से च्युत अवसरपरस्त लालची जीव होता है तो शुभचिंतक इन सबसे कोसों दूर। यही दोनों को एक दूसरे से जुदा करते हैं।

मित्रो! चमचा लाख अपना होने के स्वाँगों के बावूजद भी चमचा ही होता है और शुभचिंतक बिना दावों, दिखावों के भी शुभचिंतक ही होता है। चमचा प्रशंसा करने में हद से अधिक चापलूस होता है तो शुभचिंतक हमारी तारीफ़ करने में पूरा कंजूस होता है। चमचे और शुभचिंतक के बीच दिन-रात का अंतर होता है। शुभचिंतक जीने का मंत्र होता है तो चमचा झूठ-मूठ में बंदे को लुभाने का यंत्र होता है। चमचा भ्रम में जीना सीखाता है तो शुभचिंतक भ्रम से दूर रखता है। चमचा होमली दिखने के बाद भी होमली फ़ीलिंग नहीं देता। शुभचिंतक सदा होमली ही होता है। चमचा अपनी जेब में सदैव डाले छोटे-बड़े निहित स्वार्थों के चलते शुभचिंतकों सी कूलिंग नहीं देता। पर हम आज सब शुभचिंतकों को नहीं, चमचों को ही बहुधा गले लगाते हैं। क्योंकि वे हमें जो हम होते नहीं, वह बनाते हैं, जो हममें है नहीं, हमें अपने भीतर वह सब बड़ी सहजता से दिखाते हैं, अस्तु!

बस, इसीलिए चमचा होना गौरव की बात है। चमचा होना साहस का काम है। चमचा होना दुस्साहस का काम है। नौकरी तो सब कर लेते हैं। पर चमचागीरी सबके बस की बात नहीं। भले ही चमचागीरी का भाव जन्मजात सब में हो तो होता रहे। तिल-तिल कर जीते हैं वे जो अपने पास इस भाव के होते हुए भी इसे दबा तिल-तिल मरते रहते हैं। ऐसी हर रोज़, हर जगह दिवंगत होती और हो चुकी आत्माओं को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि! भगवान ऐसी आत्माओं की सुधारने की कोशिश करें,” कह साहब ने सिर झुका दो मिनट का मौन रखा और उसके बाद बोले, “तो दोस्तो! कुछ ज़ुबान से चमचे होते हैं तो कुछ काम के। कुछ कान के चमचे होते हैं तो कुछ नाम के। कुछ पार्ट टाइम चमचागीरी करते हैं तो कुछ फ़ुल टाइम। कुछ सखा भाव के चमचे होते हैं तो कुछ दास्य भाव के। अपना सब कुछ अपने आराध्य के चरणों में न्यौछावर कर उसके दिमाग़ में जगह बनाना आसान नहीं। चमचागीरी बेहद कमीनेपन का काम है। मिमियाते हुए, खिसियाते हुए किसी के आगे बल खाते हुए, जूते खाने के बाद भी मंद-मंद मुस्कुराते हुए, हद से पार जाना ही चमचागीरी है। जो अपने साहब के दिमाग़ में जगह बना गया मानों वही चमचागीरी का अमृत पा गया।

कोई माने या न माने, पर चमचे होते बड़े कुत्ती चीज़ हैं। इनके पास ऐसी गीदड़ सींगी होती है कि जिसे ये एकबार सूँघा दें वह इनके वश में हो जाए। इनके पास किसी को भी वश में करने के ऐसे-ऐसे सिद्ध मंत्र होते हैं कि.......पहले तो ये किसी के इशारों पर नाचते हैं और फिर पता ही नहीं चलता कि कोई कब इन के इशारों पर नाचने लग जाए। फिर ये साहब का नहाना-खाना-पाखाना सब तय करते हैं। इनसे कोई नहीं बच सकता। न इंसान, न भगवान और न ही शैतान।

ख़ैर! जो साहब के लिए दिनरात मरते-खपते रहते हैं, इतना तो उनका हक़ बनता ही है कि वे... सम्मानित हों, पुरस्कृत हों, अलंकृत हों। तिरस्कृत तो वे हर जगह अकसर होते ही रहते हैं। इसलिए मैंने बहुत सोचा, सोए-सोए भी बस यही सोचा, जागे हुए भी बस यही सोचा, ऑफ़िस के सारे काम छोड़ बस यही सोचा! और उसी सोच का नतीजा आज आपके सामने फलीभूत हुआ है।

तो अधिक न कहता हुआ इसलिए कि चाय-समोसे ठंडे हो जाएँ, साहब भक्ति का सांत्वना पुरस्कार दिया जाता है... यह अवार्ड उसके लिए है जिसने साहब के चरण दबाए तो सही पर मन मसोस कर। ...तो यह सम्मान जाता है मिस्टर एके को! वे आएँ और...” एके उठे और सिर नीचा किए मंच पर गए, तो साहब ने उन्हें पुराने घर में बेकार हो चुके चमचों का एक सेट पुरस्कार रूप में भेंट किया। उन्होंने साहब से चमचागीरी का सांत्वना पुरस्कार प्राप्त किया और सिर नीचा किए ही मंच से उतर कर अपनी सीट पर आ गए। कम्बख़्त एक भी ताली न बजी।

अब बारी है विशिष्ट चमचा पुरस्कार की। यह वह पुरस्कार है जो ज़रा हटकर साहब की चमचागीरी करने वाले को दिया जाना है। इसके लिए मैं मंच पर आमंत्रित करना चाहूँगा...” एक पल के लिए पंडाल में सन्नाटा सा छा गया, “तो इस पुरस्कार के सही हक़दार हैं मिस्टर बीके। कृपया वे मंच पर आएँ और....” बीके अपना कोट ठीक करते हुए मुस्कुराते हुए मंच पर आए तो उनके स्वागत के लिए कुछ तालियाँ बजीं। बीके ने साहब को आधा झुक प्रणाम करते अपना पुरस्कार लिया- एल्मूनियम के दो नए चमचे।

मंद-मंद मुस्कुराते बीके अपनी कुर्सी पर बैठे तो साहब ने अगले पुरस्कार की घोषणा करते कहा, “अब चमचागीरी में अतिविशिष्ट पुरस्कार की बारी है। और यह पुरस्कार जाता है... जाता है... मिस्टर केपी को। उनके लिए इस उपलब्धि पर ज़ोरदार तालियाँ?” और देखते ही देखते तालियों से पंडाल गूँज उठा। मिस्टर केपी ने सबको नमस्कार किया और उसके बाद मंच पर आधे झुके चढ़ गए। साहब ने इनको स्टील के दो चमचे दे सम्मानित किया तो एक बार फिर पंडाल में तालियाँ गूँजी।

“ ...और अब बारी है चमचा ऑफ़ द ईयर के सम्मान की,” साहब ने ज्यों ही आँखों पर से चश्मा उठा पंडाल की ओर देखा ...कि चार जने एक साथ उठने को हुए। यह देख उन्हें हँसी भी आई। आख़िर उन्होंने इस पुरस्कार पर से सस्पेंस ख़त्म करते कहा, “माफ़ कीजिएगा! यह अवार्ड जाता है मिस्टर जीके को! इनको इनकी इस शानदार उपलब्धि के लिए ज़ोरदार-शोरदार तालियाँ!” पंडाल एकबार फिर तालियों-गालियों की गड़गड़ाहट से गूँजा। साहब ने उन्हें पुरस्कार में भेंट किए स्टील के दो हाथी के दिखाने के दाँत से चमचमाते चमचे।

एक बार फिर साहब ने अपना गला साफ़ किया और अपने कोट के कालर ठीक करते कहा, “तो अब...,” अभी साहब ने अपना वाक्य पूरी भी नहीं किया था कि दो जने आरके और एसके एक दूसरे को घूरते खड़े हो गए। इससे पहले कि वे दोनों एक दूसरे को पछाड़ मंच पर जा पहुँचते साहब ने कहा, “तो इस अवार्ड के असली हक़दार हैं मिस्टर एसके,” उनके कहने भर की देर थी कि एसके अपनी कुर्सी से ही झुके हुए उठे और दोनों हाथ जोड़े, एक अपनी तो एक आज के आयोजन के लिए विशेष रूप से किराए पर लाई पूँछ को अदब से हिलाते मंच पर जा पहुँचे। मंच पर पूँछ हिलाते पहुँच उन्होंने सबसे पहले साहब के कुत्ते से हाथ मिलाया और उसका हालचाल पूछते कहा, “हाऊ आर यू डियर!” हालाँकि साहब के कुत्ते ने उनके साथ हाथ मिलाने में कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं ली। पर फिर भी वे ज़बरदस्ती बड़ी देर तक उसका पंजा पकड़े रखे। उससे हाथ मिलाने के बाद उन्होंने साहब की पत्नी के पूरी आस्था से पाँव छुए। साहब की पत्नी के पाँव छूने के बाद उन्होंने साहब को दस बार साष्टांग प्रणाम किया तो साहब की आँखें नम हो आईं। बड़ी मुश्किल से साहब ने उनकी झुकी कमर सीधी की तो पंडाल में एक बार फिर तालियों का शोर गूँजा। एसके को पुरस्कार में साहब ने चाँदी के दो चमच दिए तो वे बिन पंख ही आसामान से बातें करने लगे। उस वक़्त वे थे कि साहब के पैर छोड़ ही नहीं रहे थे। तब साहब ने बड़ी मुश्किल से अपने चमचमाते जूतों पर रखे सिर को उठाया और अपने गले लगाते हुए भाव विभोर हो कहा, “ऐसे होते हैं विशुद्ध साहब के चमचे,” फिर भावातिरेकी एसके के आँसू पोंछते बोले, “असल में इस अवार्ड के चयन के लिए मुझे बहुत मेहनत करनी पड़ी। पिछले कई साहबों से जानकारी जुटानी पड़ी। तब कहीं जाकर ये कठिन काम हो पाया। पर हो गया। इस अवार्ड में पूरी तरह ट्रांसपेरेंसी बरती गई है। मैं इस अवार्ड हेतु इन्हें बहुत-बहुत बधाई देता हूँ। मेरी भगवान से यही प्रार्थना है कि वे इस काम में यों ही निरंतर आगे बढ़ते रहें और औरों का भी कुशल मार्ग दर्शन करें,” एकबार फिर एसके ने पूरी निष्ठा से साहब के चमचमाते जूते चूमे और मंच से मस्त हाथी की चाल में अपनी जगह पर आ गए।

कुछ देर तक पंडाल में उनके ग्रुप के उनको गले लगाते रहे, उन्हें बधाई देते रहे, उनके गले में काग़ज़ी फूलों की मालाएँ डालते रहे। उनके गले में डाली मालाएँ निकाल अपने गले में डालते रहे। जब माहौल कुछ शांत हुआ तो साहब ने आगे कहा, “तो आज का यह चमचा सम्मान समारोह यहीं समाप्त होता है। सम्मानितों को मेरी ओर से एक बार फिर बधाई। और वे जो इस काम में पीछे रह गए हैं, उनसे एक निवदेन ज़रूर करना चाहूँगा, वे अभी भी मुझे गालियाँ देते हों तो देते रहें, इससे मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। और वह निवेदन यह कि.... ऑफ़िस के काम तो होते रहते हैं। कभी साहब के काम आकर भी देखो तो.... साहब की चमचागीरी में जो मज़ा है वह ऑफ़िस के काम दिन-रात करने में कहाँ! पर जो कोई समझे तो??? ज़्यादा न कहता हुआ अब जय हिंद!” पुरस्कृत मंच पर तो अन्य अपनी-अपनी जगह राष्ट्रगान के लिए आड़े-तिरछे, लटके-सटके खड़े हो गए। राष्ट्रगान भले ही गाया कैसेट ने हो।


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