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ISSN 2292-9754

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01.31.2016


सुबह की धूप

सुबह की धूप
खेलती
मेरी गोद में,
प्यारी नन्ही सी
फुदफुदाती,
कभी आँगन में
क्रीड़ाएँ करती
उछलकर इधर-उधर
चढ़कर दीवाल पर
धम्म नीचे गिरकर
ताली पीटती
खिलखिलाती!

मुझे अच्छी लगती
जब गाल पर
चुप्पी लगाकर
छत से
अँगूठा दिखाती,
मुँह
छोटा हिलाकर!
पल में
बाल विखराकर
हज़ारों में
रूप बदलकर
भयंकर,
डराती
किन्तु शांत होकर
कान में कहती
कल लौटूँगी
खेलूँगी
फिर से
तुम्हारी गोद में
करूँगी नृत्य गायन
आँगन में!


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