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ISSN 2292-9754

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05.09.2016


और अब

 और अब
ज़िंदगी बीत चुकी
यूँ ही
हकलाते, हकलाते
किन्तु,
न उतरी
गुत्थी शब्दों की
होंठों से।

काग़ज़ दहलीज़ पर
क़लम भी
चिंतित
शून्य सा भटकता
अँधेरे में,
ठोकरें खाता दीवालों की
अभिशाप सा।

चन्द छत पर
रोशनी लेकर खड़ा
घेर लेतीं
बदरियाँ उसे
मुँह दबाकर,
अधूरी रह जाती
व्याख्या शब्दों की
और शब्द निहत्थे
लौट जाते
दुखित होकरI।


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