अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली

मुख पृष्ठ
08.26.2017


समय से माफ़ी

झूठ-साँच के झगड़े में
हम बने तमाशाई,
अगर कर सके समय
हमें तू माफ़ कर देना!

सच्चाई ने की गुहार
हम बहरे बने रहे,
अपने मन पर आशंका के
पहरे बने रहे,
आँखों के रहते हमको
कुछ दिया न दिखलाई!
अगर कर सके समय
हमें तू माफ़ कर देना!

औरों के झंझट से हमको
क्या लेना-देना,
उथली नदिया, नाव स्वयं की
बस उसमें खेना,
हमें डराती रही उम्र-भर
अपनी परछाई!
अगर कर सके समय
हमें तू माफ़ कर देना!


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें