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05.20.2014


खोल के गठरी

पोंछा नहीं पसीना मेरा
देखी नहीं थकन
खोल के गठरी बैठ गया है
सारा घर-आँगन

बिट्टू ने मुँह लटकाया
ना लाये मोटरकार
छुटकी को है नापसन्द उफ्
मोती वाला हार
पलट-पलट कर देख रही माँ
नर्म, रेशमी शाल
रंग ज़रा-सा हल्का है बस
दिल में यही मलाल
हाय, दुपट्टे में कट निकला
गुमसुम हुई बहन
खोल के गठरी---

पत्नी को साड़ी का पल्लू
छोटा लगता है
बापू को कुर्ते का कपड़ा
मोटा लगता है
ये छोटू के पेंट-शर्ट
कुछ बड़े-बड़े से हैं
बाकी तो सब ठीक-ठाक
अंगूर सड़े-से हैं
रस्ते की कोई न पूछता
वर्षा, धूप, तपन
खोल के गठरी---


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