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05.20.2014


कबिरा खड़ा उदास

होठों पर मधुमास सजा है
अन्तस में संत्रास
यहाँ-वहाँ हर ओर जगत में
मात्र विरोधाभास

जो हैं अपने
सभी बगल में
छुरी दबाये हैं
अक्सर
विश्वासों से हमने
धोखे खाये हैं
वह उतना ही दूर निकलता
जितना लगता पास!

सच्चाई के
माथे पर हैं
बूँद पसीने की
कौन जानता
कला यहाँ पर
मरने-जीने की?
मृग -मरीचिका बनकर उभरे
खुशियों का अहसास।

इच्छाएँ हैं ढेर
हमारी
चादर छोटी है
पड़े-पड़े हम
रहें कोसते
किस्मत खोटी है
दो पाटन के बीच पिसें सब
कबिरा खड़ा उदास!

यहाँ नैनसुख
आँखों पर हैं
पट्टी को बाँधे
जिनके ऊपर
भार सत्य का
झुके वही काँधे
बरसे कंबल, भीगे पानी
लगे नदी को प्यास!


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