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03.15.2017


बरसना था नहीं बरसे

बरसना था नहीं बरसे जो फिर बरसे तो क्या बरसे
बहुत प्यासी है ये धरती कोई बादल ज़रा बरसे

मैं अच्छा हूँ बुरा हूँ जो भी हूँ मुझको नहीं मालूम
मगर इक घाव में पाऊँ तो दुनिया से दुआ बरसे

ज़रा हँस-बोलना उनसे ये क्या तूफ़ान ले आया
धुआँ उट्ठा कि शोले चारसू बेइन्तिहा बरसे

घटा पहले भी घिरती थीं, लरजती थीं, बरसती थीं
जो अबकी बार तुम हो तो ये बादल कुछ जुदा बरसे

खिले हैं फूल घर-आँगन का हर कोना महकता है
ये होता है तभी जब बुज़ुर्गों का तजरुबा बरसे


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