अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
06.01.2017


मैं, थक गया हिंदुत्व हूँ

बस करो की साँस लूँ, मैं थक गया हिंदुत्व हूँ
आस्था हूँ कर्म हूँ विश्वास का मैं तत्त्व हूँ
प्राण गंगाजल चढ़े मैं अंत माहात्म्य भीष्म का
मृत्यु शैय्या पर पड़ा मैं भी तेरा दायित्व हूँ
बस करो की साँस लूँ, मैं थक गया हिंदुत्व हूँ।

जातियों में पंथ में, तुमने मुझे तोड़ा यहाँ
निज रूप से कोई भला कैसे अलग होगा कहाँ
प्रार्थना में ईश की उपहासनाएँ मैंने सुनी
अल्प ज्ञानी धर्मरक्षक बन गए जोगी यहाँ
राजपूतों, ब्राह्मणों, मैं हरिजनों का रक्त हूँ
बस करो की साँस लूँ, मैं थक गया, हिंदुत्व हूँ।

सीख दो नयी नस्ल को ये इतिहास का कुछ ज्ञान दो
चंद्र का गौरव सुने, चौहान का कुछ मान हो
चण्ड की गाथा कहो, जौहर की पीड़ा से जलें
वे ये तो अंतर जान लें, क्या भीख हो, क्या दान हो
मराठा, पुताना, बुंदेलों मैं द्रविडों का सत्त्व हूँ।
बस करो की साँस लूँ, मैं थक गया हिंदुत्व हूँ


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें