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ISSN 2292-9754

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06.01.2017


छोटी स्केल

क्या कभी सुना है
ख़ामोश ट्रेन
और गड़गड़ाती खिड़कियों को
चीखते चिल्लाते बदहवास यात्रियों को
और कोने में फुसफुसाते टी.सी. और
बिना टिकिट यात्रियों को
एक दम चुप बाहर झाँकते बच्चे
या सीट के लिए घूरते उस शख़्स को
टोका है कभी,
दूर होते खेतों, तलाबों, पेड़ों को
और चिपके गंध उड़ाते इंसानों को
महसूस किया है कभी,
गंगा के पुल पर बीचोंबीच,
बेवजह वक़्त गुज़ारती
रेलगाड़ी के साथ ठिठोली की क्या
मूँगफली बेचता वो बूढ़ा अंधा
और भीख माँगते कई नौजवान
लंगड़े कम्पट वाले से कम्पट ख़रीदा है
भागती ट्रेन में ठहरे हुए लोग
दूसरों की मंज़िलों से अनजान
हर मंज़िल पर उतरने को तैयार लोग
अनजान राहगीरों को हमसफ़र बनाते
देखा है कभी,
प्लेटफॉम पर दूर से आती उस औरत की आवाज़
और फोन में चलते बेतरतीब गानों की जुगलबंदी
की है कभी,
एक लंबी ज़िन्दगी को छोटी स्केल पे
महसूस करना हो तो बोलो
मेरे संग ट्रेन में चलना
आपको असली जीवन का दर्शन होगा


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