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ISSN 2292-9754

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10.18.2016


राह

सौम्य के मित्रों रिश्तेदारों और बड़े से सर्किल में जिसने भी सुना वह चौंक गया। सभी केवल एक ही बात कह रहे थे "भला यह भी कोई निर्णय है।"

सबसे अधिक दुखी और नाराज़ उसकी माँ थीं। होतीं भी क्यों नही। पति की मृत्यु के बाद कितनी तकलीफ़ें सह कर उसे बड़ा किया था।

"इसे निरा पागलपन नहीं तो और क्या कहेंगे। इस उम्र में इतनी सफलता यह ऊपर वाले की कृपा ही तो है। तुम्हारे लिए इन सबका कोई मूल्य नहीं है," माँ ने बड़े निराश भाव से कहा।

"क्यों नहीं है माँ। मैं ईश्वर का शुक्रगुज़ार हूँ। तभी तो उसकी संतानों की सेवा कर उसका शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ," सौम्य ने अपना पक्ष रखा।

"सारी दुनिया के ग़रीब बेसहारा लोगों के लिए एक तुम ही तो बचे हो," माँ ने ताना मारा।

सौम्य नहीं जानता था कि वह अकेला है या इस राह के और भी राही हैं। परंतु उसके भीतर एक कीड़ा था जो उसे पिछले कई दिनों से कुछ करने को उकसा रहा था।

ऐसा नहीं था कि यह निर्णय उसने भावावेश में बिना कुछ सोचे समझे ले लिया था। दरअसल विद्यार्थी जीवन से ही उसकी सोच औरों से अलग थी। सदा से ही वह देश और समाज के लिए कुछ करना चाहता था।

ऐसा भी नहीं था कि वह स्वयं को बर्बाद कर दूसरों के लिए कुछ करने वाला था। फ़र्क़ इतना था कि उसक सोच अपने तक ही सीमित नहीं थी। अब तक उसने जितना अर्जित किया था उससे उसकी माँ का जीवन आराम से कट सकता था। जहाँ तक उसका प्रश्न था, उसने अपनी आवश्यकताओं को बहुत सीमित कर लिया था।

अब पीछे हटना अपने आप को धोखा देना था। अतः कुछ भी उसे विचलित नहीं करता था। सारे तानों उपहासों को अनसुना कर वह अपने पागलपन में मस्त जो ठाना था उसे पूरा करने के लिए आगे बढ़ रहा था।


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