अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
01.23.2017


अपना ठिकाना

विनय को मकान पसंद आया। उस अकेले के लिए पर्याप्त जगह थी। उसने आवश्यक अग्रिम राशि जमा कर दी।

अविवाहित विनय ने अपने छोटे भाइयों को पुत्रवत पाला था। उन्हें उनके पैरों पर खड़ा करने के लिए अपने सुखों का भी त्याग किया था। जीवन भर किराए के मकान में रहे। उनके परम मित्र राजेश अक्सर कहते थे, "भाइयों के लिए कुछ करना बुरा नहीं पर अपने बारे में भी सोचो। कल जब यह दोनों अपनी गृहस्थी बसा लेंगे तो तुम क्या करोगे। कहाँ रहोगे।" लेकिन विनय अपने तर्क देते थे, "मैं तो अकेली जान हूँ। दोनों भाइयों को बेटे की तरह पाला है। किसी के भी साथ रह लूँगा।"

"ईश्वर करे आपका भरोसा सही निकले लेकिन मैं तो दुनिया का चलन देखते हुए कह रहा था," राजेश उन्हें दुनिया की सच्चाई दिखाने की कोशिश करते थे।

दोनों भाइयों ने अपनी अपनी गृहस्थी बसा ली। अवकाशग्रहण के बाद वह कभी एक के यहाँ तो कभी दूसरे के यहाँ जाकर रहते। कुछ दिन तो ठीक लगा परंतु धीरे-धीरे उन्हें एहसास होने लगा कि यह व्यवस्था ठीक नहीं। प्रत्यक्ष तौर पर तो कोई कुछ नहीं कहता था लेकिन अक्सर ही अपने व्यवहार से दोनों भाई उन्हें इस बात का आभास कराते कि वह उनके घर में रह रहे हैं।

देर से ही सही बात उनकी समझ में आ गई। उन्होंने अपने लिए अलग किराए का मकान ले लिया।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें