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ISSN 2292-9754

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06.17.2016


 जलाओ एक दीपक और…

बेशक आज यहाँ
चकाचौंध बहुत है,
जलाओ एक दीपक और -
अँधेरा बहुत है।

जानता हूँ रोटियाँ बहुत हैं,
फ़सलों की उपज बहुत है
पर ग़ौर से देखो
बिलबिलाती भूख भी बहुत है।

फुटपाथ, ट्रेन के जनरल डिब्बों,
झुग्गी झोंपड़ियों में –
बसी पीड़ाओं का मंज़र तो देखो
शायद कुछ लगे और दिखे
चुनौतियों के आलम आज भी बहुत है।

संस्कृतियों के मिलाप की
तस्वीरें बहुत है,
पटेल, गाँधी, नेहरू और भी अनेक है।
पर कश्मीर के पंडित –
हिन्दू-मुस्लिम सभी विखंडित
डरी-सहमी सी औरतों को देखो
शायद कुछ लगे और दिखे
शोध में प्रतिशोध की दुर्गन्ध बहुत है।

सभ्यताओं को जोड़ने के
पुराने रिवाज़ बहुत हैं
पर तोड़ने को उनके
आज सवाल बहुत हैं।
भारत-पाक और खुले-बेख़ौफ़
आतंकवाद को देखो
शायद कुछ लगे और दिखे
आदमी-आदमी में दीवारें बहुत है।

खण्डित से अखंडित होने की पगडंडियाँ बहुत है
इतिहास के पन्नों को उलटकर देखो गवाह बहुत है
माला के मोती, फूलों के हार
गाड़ियों के पहियों को देखो
शायद कुछ लगे और दिखे
अनेकता में एकता की परछाइयाँ बहुत है।


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