अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
08.17.2014


यादों का क़र्ज़

उदास, अकेली रातों में
जब ख़ुद को तन्हा पाओगे
यकीन मुझे है तुम मेरी
यादों के दीप जलाओगे

झाँकोगे जब खोल खिड़कियाँ यादों की
सोचोगे क्या भीगी पलकें कह गईं
अरमान भरे दिल की दुनिया
पलक झपकते भरभरा कर ढह गई

खामोश जुबां बे-ख़्वाब सी आँखें
अंतिम भेंट विदाई की
एक टूटा दिल, कुछ कड़वी यादें
साथ यही तो आई थीं

उस पल तो महसूस हुआ था
उजड़ गई जीवन-फ़ुलवारी
फ़िर तत्काल लगा था जैसे
शुरू हुई हो अगली पारी

आँखों से छलके अश्कों को
शब्दों का जामा पहनाया
प्रथम कृति ये तुम्हें समर्पित
मैंने यादों का क़र्ज़ चुकाया


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें