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ISSN 2292-9754

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06.14.2014


स्त्री

गले में बाँहे डाल एक दिन बिटिया ने किया इसरार
माँ, मुझ पर भी लिखो ना पंक्तियाँ दो-चार

उसकी मासूम मनुहार पर मैं मुस्कुराई
स्त्री होने की पीड़ा मेरी आँखों में उतर आई

नारी पर कलम चलाऊँगी तो शब्द कम पड़ जाएँगे
स्याही की दरकार नहीं अश्कों से काम चलाएँगे

शुरू तुम्हीं से हर कहानी, ख़त्म तुम्हीं पर होती है
सबको फूल-बिछौना दे कर खुद काँटों पर सोती है

अधरों पर मुस्कान खेलती और आँख में पानी है
त्याग-समर्पण की ये मूरत सर्व-विदित महादानी है

अपूर्वा है, अद्वितीया है नायाब हर स्वरूप है
ईश्वर की ये अनुपम रचना उसका ही प्रतिरूप है

सफलतम हर शख़्स के पीछे रही हमेशा नारी है
मान-सम्मान के एक हिस्से की, ये भी तो अधिकारी है


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