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ISSN 2292-9754

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06.15.2014


माँ तुम्हें नमन

आज कुछ शब्द ये तुम्हारे नाम करती हूँ,
माँ तुम्हें नमन तुम्हें सलाम करती हूँ।
तन्हाइयों में जब अपना बचपन जीती हूँ
तुम्हें रुलाये सारे आँसू मैं घूँट-घूँट पीती हूँ।
अनसुना कर तुम्हें न जाने कितना सताया होगा,
अनदेखा कर तुम्हें, तुम्हारा दिल दुखाया होगा।
जब कोई तीर मेरे शब्दोँ का छूटा होगा,
न जाने तुम्हारे मन का कौन सा कोना टूटा होगा।
मैं सताती रही, तुम सहती रही
मैं रुलाती रही, तुम हँसती रही
तुम दीपशिखा सी जलती रही,
मैं उसी रोशनी में पलती-बढ़ती रही।
इस शब्द की गहराई मुझे तब समझ आई,
जब मेरी अपनी बेटी मेरी गोद में आई।

उस नन्ही सी जान ने
सिखा दिया मुझे कि माँ क्या होती है,
चोट अंग को लगे तो
आँख क्यों रोती है।
एक ही पल में मैं जी गई
तुम्हारे सारे अहसास,
उसी पल बन गई तुम
मेरे लिये सबसे खास।
आज जब मेरी बेटी
मुझे गुस्से में कुछ सुना जाती है,
तुम्हारी वो सारी पीड़ा जो मैंने तुम्हें दी थी,
मेरी आँखो में उतर आती है।
अब गुस्सा नहीँ हँसी आ जाती है,
मैं तुम्हें नहीं समझी, ये मुझे नहीं समझ पाती है।
माँ होने के अहसास को ये भी उस दिन समझ जाएगी,
जिस दिन इसकी अपनी बेटी
इस की गोद में आएगी।


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