अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
07.26.2016


सपनों की उड़ान

मैंने सोचा भी न था फिर कभी इस शहर में आाऊँगी पर आज 15 वर्ष बाद मैं जब यहाँ आई तो मेरा बहुत सम्मान हुआ। मेरे स्वागत के लिए कई लोग आए। मुझे फूलों की माला पहनाई गई क्योंकि आज मैं एक जानी-मानी हस्ती हूँ। हाँ मैं एक क्लैक्टर हूँ। आज मेरे पास एक प्रतिष्ठित ओहदा है। मेरी समाज में अपनी पहचान है। मैं बचपन में काफ़ी दुबली-पतली थी। मेरे रंग-रूप का सभी उपहास उड़ाते थे। मैं तो आज भी वैसी हूँ, बस लोगों के देखने का नज़रिया बदल गया है। दो भाइयों के बाद जब मेरा जन्म हुआ तो मेरी माँ को बहुत ख़ुशी हुई क्योंकि उन्हें भी अब अपना सुख-दुख बाँटने वाला कोई मिल गया। परंतु मेरे पापा व परिवार के अन्य सदस्यों को जैसे कि साँप सूँघ गया। मैं इसी माहौल में पलने लगी। जब कभी दर्द अधिक बढ़ जाता तो गंगा के किनारे रोकर अपना जी हल्का कर लेती। माँ के स्नेह और परिवार वालों के तानों ने मुझे अंर्तमुखी बना दिया था। मैं स्कूल में हर विषय में अव्वल रहने के बाद भी अपने घर में ही सदैव अपमानित होती रहती। मेरे पापा मेरे चाचा-चाची कहते कि इसे कौन-सा क्लैक्टर बनना है जो इसकी पढ़ाई पर ख़र्चा किया जाए पर मेरी माँ ने इसका ज़ोरदार विरोध किया। इसलिए उन्हें परिवार वालों के कोप का भाजन बनना पड़ा। मेरे चाचा-चाची कहते कि इसे ज़्यादा मत पढ़ाओ वरना लड़का नहीं मिलेगा पर मेरी माँ ने मन में कुछ और ही सोच रखा था। हाँ, मेरी माँ मुझे क्लैक्टर बनाना चाहती थी और मुझे भी हर हाल में अपनी माँ का सपना पूरा करना था।

जब मैं कॉलेज में पढ़ने गई तो वहाँ मेरी दोस्ती पराग से हो गई पर शायद मैं उससे प्यार करने लगी थी। लेकिन कभी कुछ कह नहीं पाई क्योंकि मैं बचपन से ही अपने रंग-रूप को लेकर हीन भावना से ग्रस्त थी। मुझे लगता था कि मुझसे कोई प्यार नहीं करता। और पराग तो मेरे लिए वह चाँद है जिसे मैं देख तो सकती हूँ पर कभी पा नहीं सकती। क्योंकि वे स्मार्ट व हैंडसम थे। पराग मुझे हमेशा कहा करते थे "न उम्र की सीमा हो, न जन्म का हो बंधन, जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन"। मैं सोचती थी कि काश कोई मुझे भी इतना प्यार करता पर सच्चाई तो कुछ और थी। धीरे-धीरे मैंने अपने आप को सँभाल लिया और यह सोचा कि पहला प्यार हमेशा अधूरा होता है। मैं तो पराग के लिए बनी ही नहीं हूँ। मैंने केवल अपनी माँ को इसके बारे में बताया क्योंकि वह मेरी सबसे अच्छी दोस्त है। उन्होंने मुझसे कहा- गुंजन बेटा प्यार तो मन से होता है, यह तो दो आत्माओं का मिलन है। यह रंग-रूप नहीं देखता केवल भावनाओं को समझता है। तुम अपने मन की बात पराग को बोल दो वरना मैं कह देती हूँ। मैंने माँ को मना कर दिया। वैसे तो मैं और पराग बहुत अच्छे दोस्त थे। मैं उनके बारे में सब कुछ जानती थी और वो मेरे बारे में। वे काफ़ी ग़रीब परिवार से थे, कहने को मैं बहुत रईस परिवार से ताल्लुक़ रखती थी परंतु सच्चाई तो मैं ही जानती थी। इसी बीच हम दोनों ने पोस्टग्रेजुएशन भी कर ली। वे अब नेट की तैयारी करने लगे। इसी दौरान मेरे घरवाले मेरे लिए लड़का ढूँढने लगे पर मेरी क़िस्मत आँखों पर मोटा चश्मा चढ़े होने के कारण हर जगह मना हो जाती। मेरे लिए रिश्ता ढूँढते-ढूँढते एक वर्ष बीत गया पर कहीं बात नहीं बन पाई।

एक दिन माँ मेरे बालों पर तेल लगा रही थी तो चाची आ गई और बोली, और लड़ाओ लाड़ इससे, "मैंने तो पहले ही कहा था कि इसे इतना मत पढ़ाओ पर मेरी सुनता ही कौन है। अब रखो इसे घर में छाती पर मूँग दलने के लिए।" अब मेरे परिवार वालों ने मुझे पार लगाने की सोच ली। मेरे लिए अधेड़ उम्र के या फिर तलाक़शुदा के रिश्ते भी ढूँढने लगे। जब मेरी माँ ने विरोध किया तो उन्हें तिरस्कार मिला पर शायद यहाँ मेरी क़िस्मत इस मामले में कुछ अच्छी रही, ऐसे जितने भी रिश्ते आए सबने मुँह फाड़कर माँग की तो मेरे परिवार वालों ने मना कर दिया। मेरे पिता मुझे मनहूस तक कहने लगे। चाचा-चाची तो किसी के पल्ले भी मुझे बाँध देना चाहते थे।

एक दिन मेरी माँ ने पराग को घर बुलाया पता नहीं उससे क्या-क्या कहा। करीब एक हफ़्ते बाद मेरी माँ ने कहा, एक लड़का है जो बिना दहेज के मंदिर में ही गुंजन से शादी करने को तैयार है पर शादी के कुछ साल तक गुंजन को गाँव में ही रहना पड़ेगा क्योंकि उस लड़के की अभी पक्की नौकरी नहीं है, इसलिए मैं दुविधा में हूँ। मेरी माँ की बात सुनकर मेरी चाची कहने लगी, "अरे! दीदी इसमें दुविधा किस बात की, आप जल्दी से लड़के का पता बताइए।" आनन-फानन में मेरी शादी मेरी मर्जी जाने बग़ैर ही पक्की कर दी गई। शादी वाले दिन जब मैंने पराग को देखा तो मैं हैरान हो गई मुझे लगा कि पराग ने मुझ पर दया कर मुझसे शादी की है। मैं बुझे मन से ससुराल आ गई। इसी बीच लगभग एक हफ़्ते में ही पराग के लिए दिल्ली से प्रोफेसर का जाइनिंग लैटर आ गया उन्हें दिल्ली आना पड़ा। इस दौरान हमारे बीच कोई बातचीत तक नहीं हुई। मेरे मन में कई सवाल थे जिनके जवाब पराग के पास थे।

मेरी सास भी मेरी माँ की तरह ही बहुत अच्छी थी। उन्होंने मुझसे कहा बेटा तुम क्लैक्टर बनना चाहती हो न तो तुम अपनी पढ़ाई जारी रखो। ऐसी सास पाकर मैं धन्य हो गई। अब धीरे-धीरे पराग की माली हालत ठीक हो गई। एक वर्ष बाद जब पराग गाँव आए तो मुझे और माँ को अपने साथ ले गए। जब मैंने अपने कमरे में क़दम रखा तो मैं हैरान हो गई क्योंकि उन्होंने पूरे कमरे में मेरे फ़ोटोग्राफ़ लगाए हुए थे। 14 फरवरी मेरा बर्थडे होता है और वैलंटाइन डे भी। पर मेरे लिए ये सब बेमानी था। 13 फरवरी की रात को पराग ने मुझे बड़े प्यार से जगाया गुलाब देकर फ़िल्मी स्टाइल में बोले, "गुंजन आई लव यू। मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ उस दिन से जब मैंने तुम्हें पहली बार देखा था पर कभी कह नहीं पाया।"

मैं सोचने लगी कहीं मैं सपना तो नहीं देख रही पर यह हक़ीक़त थी। मैंने कहा, "पराग तुम झूठ बोल रहे हो कहाँ तुम और कहाँ मैं। तुमने मुझसे शादी कर ली वरना तो मैं आज भी…."
पराग ने कहा, "ऐसा कुछ नहीं है सब भूल जाओ। मैं तुमसे प्यार करता हूँ इसलिए तुमसे शादी की और तुम्हारी मम्मी से अपने दिल की बात कही क्योंकि तुमसे कहता तो तुम यक़ीन ही नहीं करती। और कौन कहता है कि तुम सुंदर नहीं हो वैसे भी सुंदरता देखने वाले की आँखों में होती है। मेरी नज़र में मेरी गुंजन दुनिया में सबसे सुंदर है।"

पराग का प्यार पाकर मेरी दुनिया ही बदल गई। जब मैं क्लैक्टर बनी तो उन्हें बहुत ख़ुशी हुई। कहते हैं कि एक सफल आदमी के पीछे एक औरत का हाथ होता है पर मैं तो कहूँगी कि एक सफल औरत के पीछे भी एक आदमी का हाथ होता है। आज मैं अपने परिवार के साथ बहुत ख़ुश हूँ। मेरा एक बेटा व एक बेटी है। जब इलाहाबाद के विश्वविद्यालय से मुझे बतौर चीफ़ गेस्ट बुलाया गया तो पराग व माँ की ख़ुशी का ठिकाना न रहा। सासू-माँ बोली - गुंजन बेटा आज समय आ गया है सबको जवाब देने का।

मैं अपनी ख़्यालों में खोई थी। तभी मेरी माँ आई और मुझे गले से लगा लिया तो मैं चौंक पड़ी।

पराग ने चेताया, "कहाँ खो गई थी गुंजन यही वेटिंग रूम में बैठी रहोगी या चलोगी भी। मैं इतनी देर से तुम्हें बुला रहा हूँ।"

जिस शहर में जिस घर में मुझे इतना तिरस्कृत किया जाता था आज वहाँ हर जगह केवल मेरी ही चर्चा है। मेरे भाषण की चर्चा हो रही है। पर मुझे इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता क्योंकि ये दुनिया तो सदैव उगते सूरज को सलाम करती है। आज मैं इतना तो जान गई हूँ कि प्यार मन से होता है, आत्मा से होता है। यह वह ख़ूबसूरत एहसास है जिसके समक्ष दुनिया के सारे सुख बेमानी हैं। आज मैं यह भी जान गई कि पराग ने सही ही कहा था- "न उम्र की सीमा हो, न जन्म का हो बंधन, जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन"।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें