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ISSN 2292-9754

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05.03.2016


कुछ माहिये

फुरसत दे कुछ ग़म से
रहमत कर इतनी
नाराज़ी क्या हमसे

जुल्फों के बूटे हैं
कांधों के तकिये
ये संग कब छूटे हैं

मौजों का खेला था
दर्द बिछड़ने का
साहिल ने झेला था

ख़ुशबू है कुछ ऐसी
तेरी यादों की
ये पुरवाई जैसी

पत्थर दिल पाया है
बोलो क्यूँ इतना
हमको तड़पाया है

जीवन वो थैला है
साँसों का जिसने
बोझा ही झेला है

रातों की पलकों पर
चाँदनी बिखरी
झीलों की अलकों पर

उठता, गिरता, चलता
जीवन में फिर भी
सपना तो है पलता

आँखों को सपना दे
टूटे इस दिल को
कोई तो अपना दे


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