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ISSN 2292-9754

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04.26.2017


आकाश

यह नीला आकाश निराला,
कभी-कभी हो जाता काला।

बादल कभी रुई से घूमें,
नए रूप लेकर के झूमे।

इन्द्रधनुष से सज जाता है,
कभी घटा काली लाता है।

जब बिजली से ये मिल जाता ,
तब झम-झम बारिश बरसाता।

तारों से ये रात सजाता,
दिन में सूरज से बतियाता।

कितना है इसका विस्तार,
सोच-सोच सब जाते हार।

देखो है आकाश सभी का,
बड़ा पुराना, नहीं अभी का।


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