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| 01.16.2009 |
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भाव मंजूषा |
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निज भावों का पार न पाती। मेरे भावों की सरिता से अन्तर में सुख दुख के निर्झर, इस आँख मिचौली में ही भाषा में शब्द हैं सीमित, भाकर सके जो हृदयंगम, मन का मीत यदि मिल जाए, भाव-भरी मंजूषा मेरी, |
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