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ISSN 2292-9754

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05.18.2016


ताश का घर

आज देखा मैंने कुछ बच्चों को,
ताश का घर बनाते।
बड़े सँभल-सँभल कर,
एक-एक पत्ता सजाते।
बड़े धैर्य के साथ घर के पूरा होने का,
इंतज़ार करते मैंने देखा उन्हें।

अचानक एक हवा का झोंका आया,
और ढह गया,
वह अधूरा ताश का घर।

ख़्याल आया दिल में
कि रिश्ते भी तो हैं कुछ ऐसे ही।
कितनी शिद्दतों से लोग बनाते हैं ये रिश्ते,
और ढह जाते हैं ये रिश्ते,
एक हल्की सी चोट से।
सवाल था मन में,
क्यों होते हैं ये रिश्ते इतने कमज़ोर
जो सह नहीं पाते एक हल्की सी चोट को?
पर कोई जबाव न था,
गर कुछ था तो बस,
सामने वह ढहा हुआ 'ताश का घर'।


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