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ISSN 2292-9754

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05.18.2016


जिज्ञासा

जाने कहाँ विलुप्त हो गया है वह शब्द,
जिसे संज्ञा दी थी 'त्याग' की।
जो रक्त रहा मानव सभ्यता का।
जो आधार रहा,
इस मानव समाज का।
जिस ने जीवित रखा,
हर रिश्ते हर नाते को।
क्यों पुरानी कथाओं में ही,
सिमट कर रह गया है यह शब्द?
क्यों पुरानी कथाएँ भी,
लगती हैं निरी कल्पना की उपज?
क्यों हो गया है हास्यास्पद ये शब्द?
क्यों समझी जाती है मूर्खता
करना इस शब्द को चरितार्थ?
जानता हूँ ये प्रश्न-चिन्ह रहेंगे निरुत्तरित सदा,
किन्तु ये प्रश्न-चिन्ह ही तो हैं
जो मानव को लाया है यहाँ तक।


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